पंजाब के मुख्य चुनाव अधिकारी सिबिन सी ने बताया है कि चुनाव आयोग ने ऐसी 8 रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को शो-कॉज़ नोटिस जारी किए हैं, जिन्होंने 2019 से अब तक न तो कोई लोकसभा, न ही विधानसभा और न ही कोई उपचुनाव लड़ा है। इन पार्टियों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत दलों की सूची से हटाने का प्रस्ताव रखा गया है।
किन पार्टियों पर है खतरा?
जिन पार्टियों को नोटिस जारी किया गया है, उनके नाम इस प्रकार हैं:
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ऑल इंडिया शिरोमणि बाबा जीवन सिंह मजहबी दल
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भारतीय मुहब्बत पार्टी (ऑल इंडिया)
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सिविल राइट्स पार्टी
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डेमोक्रेटिक कांग्रेस पार्टी
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डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी
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फूले भारतीय लोक पार्टी
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राष्ट्रीय जागरूक पार्टी
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साडा पंजाब पार्टी
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, इन सभी दलों ने पिछले 6 वर्षों में कोई भी उम्मीदवार नहीं खड़ा किया है। इसके अलावा, इन पार्टियों के जो पते दर्ज हैं, वे भी अब अप्रासंगिक या ग़लत पाए गए हैं। इस आधार पर आयोग का मानना है कि ये पार्टियां अब सक्रिय नहीं हैं और चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले रही हैं।
क्या है आगे की प्रक्रिया?
इन सभी पार्टियों को 15 जुलाई 2025 तक अपने पार्टी अध्यक्ष या महासचिव के हस्ताक्षर सहित हलफनामा और समर्थन दस्तावेजों के साथ लिखित जवाब भेजने को कहा गया है। यदि वे यह साबित कर सकें कि वे अभी भी सक्रिय हैं और कानून के अनुसार कार्य कर रही हैं, तो उनका पंजीकरण बच सकता है।
23 जुलाई 2025 को सुनवाई निर्धारित की गई है, जिसमें इन पार्टियों के प्रतिनिधियों को खुद उपस्थित होना अनिवार्य किया गया है। यदि कोई जवाब या उपस्थिति नहीं होती, तो आयोग इसे यह मानकर चलेगा कि पार्टी के पास कहने को कुछ नहीं है और बिना किसी अतिरिक्त नोटिस के कार्रवाई कर दी जाएगी।
क्यों है यह कदम ज़रूरी?
चुनाव आयोग का यह कदम उन राजनीतिक दलों की पहचान करने और उन्हें हटाने के लिए है जो केवल कागज़ों पर मौजूद हैं और व्यावहारिक रूप से किसी भी जन प्रतिनिधित्व या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग नहीं ले रही हैं।
इससे न केवल चुनाव व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी, बल्कि ऐसे नाममात्र के दलों के जरिए काले धन, टैक्स चोरी या राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना भी कम होगी।
यह कार्रवाई दिखाती है कि चुनाव आयोग अब ऐसे निष्क्रिय दलों पर सख्ती से नजर रख रहा है, जो केवल नाम के लिए रजिस्टर्ड हैं लेकिन उनका कोई राजनीतिक योगदान नहीं है।
