पंजाब के किसानों के लिए 14 अगस्त 2025 एक ऐतिहासिक दिन साबित हुआ। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में किसानों के हित में एक बड़ा फैसला लिया गया। बैठक में यह तय हुआ कि लैंड पूलिंग पॉलिसी 2025 और प्रत्यक्ष खरीद के जरिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया जाए। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद उसी दिन आवास एवं शहरी विकास विभाग ने अधिसूचना जारी कर दी।
क्या था मामला
मई और जून 2025 में पंजाब सरकार ने दो अहम नीतियां लागू की थीं—लैंड पूलिंग पॉलिसी 2025 और प्रत्यक्ष खरीद प्रणाली। इनका उद्देश्य था शहरी विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त भूमि जुटाना। इस व्यवस्था में किसानों की जमीन का अधिग्रहण कर उन्हें या तो मुआवजा दिया जाना था या फिर विकसित प्लॉट वापस किया जाना था।
सरकार का मानना था कि इससे शहरों का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा, नई टाउनशिप और इंडस्ट्रियल ज़ोन विकसित होंगे, और निवेश को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह योजना किसानों के बीच विवाद का कारण बन गई।
किसानों का विरोध क्यों हुआ
नीति लागू होते ही राज्यभर के कई जिलों में किसान संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। किसानों का कहना था कि—
- जमीन उनकी रोज़ी-रोटी का मुख्य साधन है।
- अधिग्रहण से उनकी आर्थिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
- यह नीति उनकी सहमति के बिना लागू की गई।
- इसमें बड़े बिल्डरों और डेवलपर्स को फायदा मिलने की संभावना अधिक है, जबकि किसानों का नुकसान होगा।
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और जमीन की असली कीमत किसानों को नहीं मिलेगी।
अधिसूचना के मुख्य प्रावधान
14 अगस्त 2025 को जारी अधिसूचना में साफ निर्देश दिए गए हैं—
- सभी कार्यवाही रद्द – नीति लागू होने के बाद जो भी प्रशासनिक और कानूनी कार्यवाहियां हुईं, जैसे खसरा नंबरों की सूची जारी करना, आपत्तियां/सहमति लेना, वह सब तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई हैं।
- LOI निरस्त – भूमि पूलिंग पॉलिसी 2025 के तहत किसानों को जारी सभी Letter of Intent (LOI) अब मान्य नहीं होंगे।
- भूमि वापसी – प्रत्यक्ष खरीद के तहत विभाग/प्राधिकरण के नाम दर्ज सभी जमीनें वापस किसानों के नाम दर्ज की जाएंगी।
- कोई शुल्क नहीं – जमीन वापस लेने की प्रक्रिया में किसानों से न तो स्टाम्प ड्यूटी, न पंजीकरण शुल्क और न ही कोई अन्य चार्ज लिया जाएगा।
यह अधिसूचना राज्य मंत्रिमंडल की स्वीकृति और राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू की गई, जिससे यह फैसला तुरंत प्रभाव में आ गया।
किसानों के लिए बड़ी राहत
इस निर्णय को किसान संगठनों ने “जनहित में लिया गया साहसिक कदम” बताया है। लंबे समय से किसान यह मांग कर रहे थे कि विकास योजनाओं के नाम पर उनकी जमीनें न छीनी जाएं। अब इस फैसले से किसानों का भरोसा सरकार पर बढ़ा है।
किसान नेताओं ने कहा कि यह जीत किसानों की एकजुटता और शांतिपूर्ण विरोध का नतीजा है। यह उदाहरण है कि जब जनता अपनी मांगों के लिए एकजुट होती है, तो सरकार को उसकी बात सुननी पड़ती है।
सरकार का दृष्टिकोण
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने फैसले के बाद कहा कि पंजाब सरकार हमेशा किसानों के साथ खड़ी है और उनके अधिकारों की रक्षा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सरकार विकास चाहती है, लेकिन ऐसा विकास जो सभी के लिए लाभकारी हो और जिसमें किसानों की सहमति शामिल हो।
आगे की योजना
सरकार ने स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में कोई भी विकास परियोजना किसानों और स्थानीय निवासियों के साथ संवाद और सहमति के आधार पर ही आगे बढ़ाई जाएगी।
नई भूमि अधिग्रहण नीतियां इस तरह बनाई जाएंगी कि—
- किसानों के अधिकार सुरक्षित रहें।
- राज्य में बुनियादी ढांचा और उद्योग का विकास हो।
- भूमि के इस्तेमाल में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित हो।
राजनीतिक और सामाजिक असर
यह फैसला राजनीतिक रूप से भी अहम है। पंजाब में किसान समुदाय का बड़ा वोट बैंक है और उनकी नाराज़गी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती थी। इस कदम से सरकार ने किसानों के साथ खड़े होने का मजबूत संदेश दिया है।
सामाजिक दृष्टि से यह कदम ग्रामीण इलाकों में स्थिरता और भरोसा बढ़ाएगा। जमीन से जुड़े विवादों और बेनामी सौदों पर भी अंकुश लगने की उम्मीद है।

