आज पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। मंदिरों में विशेष सजावट, झांकियों और भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया है। श्रद्धालु उपवास रखकर मध्यरात्रि तक भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का इंतजार करते हैं।
मथुरा और वृंदावन में इस अवसर पर विशेष रौनक देखने को मिल रही है। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया गया है। प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर और श्रीबांके बिहारी मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। भक्तजन “हरे कृष्णा, हरे राम” के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बना रहे हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 5000 वर्ष पूर्व मथुरा की कारागार में माता देवकी और वसुदेव के घर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उस समय राजा कंस के अत्याचार से जनता भयभीत थी। आकाशवाणी में कहा गया था कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा। इसी भविष्यवाणी से भयभीत होकर कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार में कैद कर लिया।
जन्माष्टमी की रात जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो कारागार के द्वार अपने आप खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव नवजात शिशु को टोकरी में लेकर यमुना नदी पार कर गोकुल पहुँचे और नंद-यशोदा को सौंप आए। वहीं से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की शुरुआत हुई।
आज देशभर के मंदिरों में उन्हीं लीलाओं की झांकियां सजाई गई हैं। बच्चों को श्रीकृष्ण और राधा की वेशभूषा पहनाई जा रही है। विशेष रूप से ‘दही-हांडी’ का कार्यक्रम महाराष्ट्र में आकर्षण का केंद्र है, जहाँ युवाओं की टीमें मटकी फोड़कर श्रीकृष्ण की नटखट लीलाओं का स्मरण करती हैं।
प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी देशवासियों को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं दीं और इसे धर्म, भक्ति और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश भी देता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि कृष्ण भक्ति से जीवन में प्रेम, शांति और सद्भाव का संचार होता है।
