नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे अब ग्लेशियर से जुड़ी एक बड़ी घटना सामने आ रही है। सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के शुरुआती विश्लेषण के मुताबिक, करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर ग्लेशियर का लगभग 2,000 फीट यानी 600 मीटर चौड़ा हिस्सा टूटकर करीब 4,000 फीट नीचे घाटी में जा गिरा। यह घटना 7,234 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से से जुड़ी बताई जा रही है।
बर्फ के साथ चट्टान और मलबा भी आया
ग्लेशियर का इतना बड़ा हिस्सा नीचे गिरा तो सिर्फ बर्फ ही नहीं, बल्कि चट्टान और भारी मलबा भी उसके साथ आया। नीचे पहुंचते ही यह मलबा पानी और मिट्टी के साथ मिलकर बेहद तेज बहाव में बदल गया। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 100 फीट ऊंची मलबे और पानी की लहर बनी, जिसने आगे बढ़ते हुए नदी के रास्ते को प्रभावित किया।
नदी का रास्ता रुका, फिर टूटा बांध
इस घटना के बाद मलबे ने ल्हेन्दे खोला नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए रोक दिया। इससे वहां अस्थायी झील जैसी स्थिति बनी। जब यह प्राकृतिक रुकावट टूटी, तो पानी, कीचड़ और बड़े पत्थरों का तेज बहाव नीचे की ओर दौड़ा और त्रिशूली नदी तक पहुंच गया। नेपाल की खड़ी पहाड़ी भौगोलिक स्थिति ने इस बहाव की रफ्तार और नुकसान दोनों बढ़ा दिए।
भूकंप ने भी बढ़ाया रहस्य
इसी दौरान चीन सीमा के पास 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज हुआ था। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि भूकंप ने ग्लेशियर को अस्थिर किया या ग्लेशियर के टूटने से पैदा हुए दबाव ने भूकंपीय कंपन जैसा असर पैदा किया।
ग्लेशियर पहले से था कमजोर
विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़ते तापमान से हिमालयी ग्लेशियरों और बर्फ से जुड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है। ग्लेशियर के पीछे हटने से बने मलबे वाले हिस्सों में पानी जमा होना और उनका कमजोर होना भी ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकता है। लांगटांग लिरुंग का यह इलाका पहले भी बड़े भूस्खलन और हिमस्खलन देख चुका है।
कुछ मिनटों में बदल गया पूरा इलाका
इस आपदा का असर नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र तक दिखाई दिया। बाढ़ और मलबे के तेज बहाव ने सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। गुरुवार तक नेपाल में मृतकों की संख्या 160 से ऊपर पहुंच चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग लापता बताए गए।
