
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों वक्फ संशोधन बिल को लेकर दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक तरफ उन्हें बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की चिंता सता रही है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय की नाराजगी से निपटना भी उनके लिए जरूरी हो गया है।
इफ्तार पार्टी के बहिष्कार से खुली नाराजगी
हाल ही में पटना में नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का मुस्लिम संगठनों ने बहिष्कार कर दिया। यह पहली बार हुआ कि मुस्लिम समुदाय ने खुलकर जेडीयू से दूरी बनानी शुरू कर दी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इमारत-ए-शरिया समेत सात मुस्लिम संगठनों ने इस इफ्तार पार्टी में शामिल होने से इनकार कर दिया। यह साफ संकेत था कि मुस्लिम वोटर नीतीश कुमार से नाराज हैं।
वक्फ बिल पर नीतीश की रणनीति
नीतीश कुमार जानते हैं कि बीजेपी के समर्थन के बिना चुनावी लड़ाई कठिन होगी, लेकिन वे यह भी नहीं चाहते कि मुस्लिम वोटर पूरी तरह उनसे दूर हो जाएं। इसलिए, उन्होंने वक्फ संशोधन बिल में कुछ अहम बदलाव करवाने का दावा किया है। उनकी पार्टी जेडीयू ने वक्फ बिल के ड्राफ्ट में कुछ सुझाव दिए थे, जिन्हें केंद्र सरकार ने मान लिया है।
वक्फ बिल में हुए बड़े बदलाव
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वक्फ संपत्ति की पहचान: अब यह तय करने के लिए राज्य सरकार कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को नियुक्त कर सकती है।
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धार्मिक स्थलों की सुरक्षा: मस्जिद, दरगाह या अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों के मौजूदा स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी।
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पुराने मामलों पर कानून लागू नहीं होगा: यानी यह कानून पिछली तारीखों से प्रभावी नहीं रहेगा।
नीतीश कुमार की कोशिश है कि इन बदलावों को मुस्लिम समुदाय के सामने पेश कर वे खुद को उनके हितों का रक्षक साबित कर सकें।
मुस्लिम वोटरों को साधने की चुनौती
नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बिहार में मुस्लिम वोटर्स पारंपरिक रूप से राजद (आरजेडी) के साथ रहे हैं। लालू यादव ने खुलकर वक्फ बिल का विरोध किया है और मुस्लिम संगठनों के प्रदर्शन में भी शामिल हुए हैं। हालांकि, नीतीश कुमार दावा कर सकते हैं कि उन्होंने ही वक्फ बिल में बदलाव करवाए हैं, जो आरजेडी के विरोध के बावजूद संभव नहीं होता।
बीजेपी के साथ रहकर भी संतुलन बनाए रखने की कोशिश
नीतीश कुमार लंबे समय तक एनडीए के साथ रहे हैं, लेकिन हमेशा उन्होंने बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व एजेंडे से खुद को अलग रखा है। हालांकि, तीन तलाक और धारा 370 जैसे मुद्दों पर बीजेपी का साथ देना उनके लिए भारी पड़ा है। यही कारण है कि अब वे मुस्लिम समुदाय की नाराजगी कम करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।
क्या यह दांव काम करेगा?
नीतीश कुमार ने भले ही वक्फ बिल में बदलाव करवाए हों, लेकिन क्या मुस्लिम वोटर उन्हें फिर से अपना नेता मानेंगे? यह सवाल बड़ा है। इफ्तार पार्टी के बहिष्कार ने दिखा दिया कि मुस्लिम समुदाय उनसे नाराज है। अब देखना होगा कि चुनाव प्रचार में वे इन बदलावों को कैसे भुनाते हैं और क्या वे मुस्लिम वोटरों की नाराजगी दूर कर पाते हैं या नहीं।
आने वाले विधानसभा चुनावों में यह साफ हो जाएगा कि वक्फ बिल पर नीतीश कुमार की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। फिलहाल, उन्होंने अपना दांव खेल दिया है, अब देखना है कि बिहार की जनता इसे कैसे लेती है।