भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान एक अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह हमारे संविधान की आत्मा और नींव है। उन्होंने इसे एक बीज की तरह बताया, जिस पर पूरा संविधान खड़ा है।
क्या कहा उपराष्ट्रपति ने?
धनखड़ ने साफ शब्दों में कहा कि संविधान की प्रस्तावना को बदला नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यही वह मूल भावना है जिस पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश ने अपनी संविधान की प्रस्तावना में बदलाव नहीं किया है।
धनखड़ का यह बयान तब आया है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने प्रस्तावना में शामिल शब्दों ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ की समीक्षा की मांग की है। इन शब्दों को 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़ा गया था।
उपराष्ट्रपति ने आपातकाल को बताया “सबसे काला दौर”
धनखड़ ने 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल को भारत के लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय समय कहा। उन्होंने कहा कि उस दौरान मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, हजारों लोग जेल में डाल दिए गए थे और संविधान की प्रस्तावना में ज़बरदस्ती नए शब्द जोड़े गए, जो संविधान की मूल भावना से मेल नहीं खाते।
उनका मानना है कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर और अन्य संविधान निर्माता जब संविधान बना रहे थे, तो उन्होंने सोची-समझी रणनीति के तहत प्रस्तावना तैयार की थी। ऐसे में आपातकाल में किए गए बदलाव उनके विचारों के खिलाफ थे।
आरएसएस ने क्या कहा?
आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में एक बयान में कहा कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ना राजनीतिक अवसरवाद था। उन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय बहस की मांग की है और इसे संविधान की आत्मा पर हमला बताया।
आरएसएस के मुताबिक, इन शब्दों को शामिल करना कांग्रेस की आपातकालीन नीतियों की विकृति थी और अब समय आ गया है कि संविधान की मूल भावना को बहाल किया जाए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरएसएस और उपराष्ट्रपति के बयानों की आलोचना की है। उनका कहना है कि संविधान की प्रस्तावना में ये शब्द हमारी धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक न्याय को दर्शाते हैं और इन्हें हटाना देश की लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ होगा।
वहीं, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और अन्य भाजपा नेताओं ने आरएसएस के सुझावों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि जो भी नागरिक संविधान की असलियत को समझता है, वह जानता है कि ये शब्द मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे।
संविधान की प्रस्तावना को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां एक ओर उपराष्ट्रपति और आरएसएस इसे संविधान की मूल भावना की बहाली मान रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर हमला बता रहा है। अब देखना होगा कि यह बहस आगे क्या रुख लेती है और क्या कोई बदलाव वास्तव में संभव है या नहीं।
