पंजाब सरकार ने भीख मांगते बच्चों को मानव तस्करी और बाल शोषण के जाल से बचाने के लिए एक सख्त और संवेदनशील कदम उठाया है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने एक नया अभियान शुरू किया है जिसका नाम है “प्रोजेक्ट स्माइल”। इस योजना के तहत, भीख मांगने वाले बच्चों की पहचान की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उनका डीएनए टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह पता चल सके कि वे किस परिवार से हैं और कैसे इस हालात में पहुंचे।
किन जिलों में शुरू हुआ प्रोजेक्ट?
इस योजना की पायलट शुरुआत फिलहाल अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, मोहाली और बठिंडा जिलों में की गई है। इन शहरों में ट्रैफिक लाइटों, रेलवे स्टेशनों और चौराहों पर बड़ी संख्या में बच्चे भीख मांगते देखे जाते हैं। सरकार का लक्ष्य है कि इन बच्चों को बचाकर उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन दिया जाए।
कैसे होगी कार्यवाही?
इस अभियान के लिए खास टीमें बनाई गई हैं। सबसे पहले ये टीमें बच्चों को उन जगहों से रेस्क्यू करेंगी जहां वे भीख मांगते हैं। इसके बाद उनका मेडिकल चेकअप और इलाज करवाया जाएगा। अगर किसी बच्चे की पारिवारिक पहचान नहीं हो पाती है, तो डीएनए जांच की जाएगी। यह पूरी प्रक्रिया जिले के डिप्टी कमिश्नर, जिला कार्यक्रम अधिकारी और सिविल सर्जन की निगरानी में होगी।
क्यों जरूरी है डीएनए जांच?
डीएनए जांच से यह स्पष्ट हो पाएगा कि बच्चा किस परिवार से है। इससे यह भी पता चल सकेगा कि क्या बच्चों को जानबूझकर भीख मंगवाने के लिए किसी गैंग या रैकेट द्वारा अपहरण किया गया है। इससे मानव तस्करी और बच्चों के शोषण में लिप्त लोगों की पहचान की जा सकेगी।
रैकेट और दोषियों पर होगी सख्त कार्रवाई
सरकार सिर्फ बच्चों को बचाना ही नहीं चाहती, बल्कि उन लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करना चाहती है जो बच्चों से जबरन भीख मंगवाते हैं या उनका शोषण करते हैं। इसके लिए “बैगिंग एक्ट 1971” में संशोधन करने की तैयारी चल रही है। इस कानून में बदलाव के बाद दोषियों को सख्त सजा और भारी जुर्माना देना होगा।
डरावने हैं गुमशुदा बच्चों के आंकड़े
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में हर साल बड़ी संख्या में 18 साल से कम उम्र के बच्चे लापता होते हैं। अनुमान है कि इनमें से कई बच्चों को भीख मांगने या अन्य गैरकानूनी कार्यों में जबरन धकेल दिया जाता है। प्रोजेक्ट स्माइल इस दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम है।
पंजाब सरकार का यह नया कदम न सिर्फ बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने की दिशा में है, बल्कि समाज में चल रही उन काली गतिविधियों पर भी करारा प्रहार है, जो मासूमों का जीवन बर्बाद कर रही हैं। यह पहल आने वाले समय में अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणा बन सकती है।
