जिंदगी की रफ्तार को दौड़ में बदलने वाले 114 वर्षीय धावक फ़ौजा सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद, इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। दुनिया भर में भारत और पंजाब का नाम रोशन करने वाले इस ‘सदी के सुपर रनर’ को आज उनके पुश्तैनी गांव ब्यास में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
फ़ौजा सिंह का अंतिम संस्कार उनके विदेश में रहने वाले परिवार के सदस्यों के आने के बाद आज दोपहर को किया गया। अंतिम दर्शन के लिए आमजन से लेकर खास लोग पहुंचे। मुख्यमंत्री भगवंत मान, पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, वरिष्ठ राजनेता, नामचीन हस्तियाँ और हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
उनकी पार्थिव देह को जालंधर के सिविल अस्पताल से उनके घर लाया गया, जहां अंतिम रीति-रिवाज़ पूरे किए गए। राजकीय सम्मान के साथ उन्हें पंचतत्व में विलीन किया गया।
राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “फ़ौजा सिंह ने भारत का नाम गर्व से ऊँचा किया है। उनके जज़्बे को सलाम है। वे मेरे साथ नशा मुक्ति यात्रा में भी शामिल रहे। उनका जाना एक अपूरणीय क्षति है।”
एक हादसा, जिसने छीन लिया जिंदादिली का प्रतीक
114 वर्षीय फ़ौजा सिंह की मौत एक दिल दहला देने वाले हादसे में हुई। वे अपने घर के पास ही थे जब एन.आर.आई. अमृतपाल सिंह ढिल्लों, जो कि फॉर्च्यूनर गाड़ी चला रहा था, ने उन्हें टक्कर मार दी। हादसे के बाद फ़ौजा सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
जालंधर देहाती पुलिस ने हादसे के 30 घंटे के भीतर आरोपी की पहचान कर ली और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपी की फॉर्च्यूनर कार भी जब्त कर ली गई। उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया।
फ़ौजा सिंह: वो नाम जिसने उम्र की सीमाओं को तोड़ दिया
फ़ौजा सिंह का जीवन एक प्रेरणा है। उन्होंने उम्र के उस पड़ाव पर दौड़ शुरू की, जहां लोग चलने में भी असमर्थ हो जाते हैं। उनके नाम कई मैराथन रिकॉर्ड दर्ज हैं:
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2000–2004 लंदन मैराथन – लगातार भागीदारी
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2003 टोरंटो वाटरफ्रंट मैराथन – 5 घंटे 40 मिनट (निजी सर्वश्रेष्ठ)
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2012 हांगकांग मैराथन (10 KM) – 1 घंटा 34 मिनट
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2013 हांगकांग मैराथन (10 KM) – 1 घंटा 32 मिनट 28 सेकंड
उनकी आखिरी मैराथन 2013 में रही, पर उनका जज़्बा अंतिम साँस तक जीवित रहा।
एक युग का अंत, पर प्रेरणा बनी रहेगी
फ़ौजा सिंह भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाती रहेगी। उनका जीवन दिखाता है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है, और जज़्बा अगर सच्चा हो तो मंज़िल दूर नहीं।
उनकी अंतिम विदाई ने एक बार फिर यह एहसास कराया कि असली हीरो वही होते हैं जो ज़मीन से जुड़कर उड़ान भरते हैं।
सलाम है फ़ौजा सिंह को – जिन्होंने दौड़ को धर्म बनाया और दुनिया को अपनी गति से जीत लिया।
