मंगलवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 29 पैसे की गिरावट के साथ 87.95 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। सोमवार को रुपया 87.66 पर बंद हुआ था। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया कमजोर रुख के साथ खुला। विदेशी मुद्रा व्यापारियों के अनुसार, अमेरिकी दबाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण रुपया इस सप्ताह भी दबाव में रह सकता है।
अमेरिका की चेतावनी से बढ़ा तनाव
रुपये में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका की ओर से भारत को दी गई चेतावनी मानी जा रही है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि अगर भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखता है, तो उस पर अमेरिकी टैरिफ (आयात शुल्क) बढ़ा दिए जाएंगे। ट्रंप ने आरोप लगाया कि भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद कर उसे भारी मुनाफे पर बेच रहा है।
घरेलू शेयर बाजारों में भी गिरावट
मुद्रा बाज़ार के साथ-साथ घरेलू शेयर बाजारों में भी गिरावट देखने को मिली। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 200.40 अंक टूटकर 80,818.32 पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 58.90 अंक गिरकर 24,663.80 पर आ गया। वैश्विक बाजारों में कमजोर रुझान और अमेरिकी नीतिगत दबाव का असर घरेलू निवेशकों पर भी साफ नजर आया।
क्रूड ऑयल और विदेशी निवेशकों का प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत में भी 0.28% की गिरावट दर्ज की गई और यह $68.57 प्रति बैरल पर आ गया। इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भी बाजार से पैसे निकाले। सोमवार को एफआईआई ने 2,566.51 करोड़ रुपये के शेयरों की बिक्री की, जिससे बाजार में और गिरावट दर्ज हुई।
भारत का तीखा जवाब, विदेश मंत्रालय ने दी सफाई
अमेरिकी चेतावनी के बाद भारत सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद पारंपरिक आपूर्ति चैन यूरोप की ओर मोड़ दी गई थी, जिससे भारत को रूस से तेल आयात बढ़ाना पड़ा। मंत्रालय ने कहा कि उस समय अमेरिका ने खुद ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए भारत द्वारा तेल आयात को समर्थन दिया था।
ऊर्जा कीमतें किफायती रखना भारत की प्राथमिकता
सरकार ने यह भी कहा कि भारत का उद्देश्य अपने उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा की कीमतों को किफायती बनाए रखना है। विदेश मंत्रालय ने अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा भारत को “अनुचित तरीके से निशाना” बनाने की निंदा की है और साफ किया है कि भारत की नीतियां राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं, न कि किसी बाहरी दबाव पर।
बाजार की नजर अमेरिकी नीतियों पर
अब बाजार की निगाहें आगामी दिनों में अमेरिका के फैसलों और भारत की ओर से की जाने वाली कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं पर टिकी हैं। मौजूदा आर्थिक हालात और वैश्विक राजनीतिक तनातनी के बीच निवेशकों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।
