रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को एक साल से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन अब तक शांति का कोई ठोस रास्ता नहीं निकल पाया है। इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम ने इस युद्ध को भारत से जोड़ते हुए नया विवाद खड़ा कर दिया है।
अमेरिका ने भारत पर लगाए आरोप
ट्रंप के प्रमुख सलाहकार पीटर नवारो ने हाल ही में बयान दिया कि यूक्रेन में शांति की राह “दिल्ली से होकर गुजरती है।” उनका कहना है कि भारत, रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है और वही पैसा रूस युद्ध में इस्तेमाल कर रहा है। यानी अप्रत्यक्ष रूप से भारत को युद्ध को बढ़ावा देने वाला देश बताया गया।
नवारो का आरोप है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन करता है और फिर उसी से भारी मुनाफा कमाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत हमें (अमेरिका को) सामान बेचकर जो पैसा कमाता है, उसी धन से रूस से तेल खरीद रहा है।
ट्रंप का टैरिफ फैसला
इस पूरे विवाद के बीच अमेरिका ने भारत पर कड़े आर्थिक कदम भी उठाए हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय सामान पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है। अब भारत से अमेरिका जाने वाले कई उत्पादों पर कुल 50 प्रतिशत तक आयात शुल्क देना होगा। यह नियम 27 अगस्त से लागू हो गया है।
अमेरिका का कहना है कि भारत से आने वाला सामान उनकी अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता है। वहीं, ट्रंप सरकार का मानना है कि टैरिफ बढ़ाने से अमेरिकी उद्योगों को राहत मिलेगी और भारत पर दबाव भी बनेगा।
भारत की स्थिति
भारत हमेशा से कहता आया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल खरीदता है। क्योंकि भारत को बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत होती है और रूस सस्ता तेल उपलब्ध कराता है। भारत का तर्क है कि यह एक आर्थिक आवश्यकता है, न कि राजनीतिक समर्थन।
साथ ही भारत ने कई बार यह भी दोहराया है कि वह यूक्रेन युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म करने का पक्षधर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है।”
अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका के बढ़ते दबाव और टैरिफ फैसले से भारत अपनी नीति बदलेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित प्राथमिकता बने रहेंगे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह विवाद भारत-अमेरिका रिश्तों को नई चुनौती दे सकता है।
