नेपाल की जानी-मानी जज और पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। साल 2016 में वह नेपाल की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश बनी थीं और अब लगभग एक दशक बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर देश की पहली महिला प्रधानमंत्री होने का गौरव हासिल किया है।
सियासी उथल-पुथल के बीच मिली कमान
कार्की की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब नेपाल गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। भ्रष्टाचार, राजनीतिक विशेषाधिकार और सोशल मीडिया प्रतिबंधों के खिलाफ जेन-ज़ी (Gen-Z) की अगुवाई में देशभर में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। इन्हीं प्रदर्शनों के दबाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और कार्की का नाम अंतरिम सरकार के नेतृत्व के लिए सामने आया।
फौज और युवा आंदोलन का समर्थन
नेपाल की सेना ने इस नियुक्ति को आसान बनाने में अहम भूमिका निभाई। साथ ही, जेन-ज़ी आंदोलन से जुड़े नेताओं ने उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में चुना। पारंपरिक सत्ता हस्तांतरण के विपरीत, उनका शपथ ग्रहण लोकतंत्र और बदलाव की चाह रखने वाले लोगों के लिए राहत और उम्मीद की खबर बनकर आया।
राजनीतिक परिवार से आईं राजनीति में
सुशीला कार्की का बचपन ही राजनीतिक माहौल में बीता। उनका परिवार नेपाली कांग्रेस के प्रभावशाली कोइराला परिवार के करीब रहा, जिसके चलते वह बचपन से ही लोकतंत्र, शासन और न्याय पर बहस का हिस्सा बनती रहीं। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सोच और जिम्मेदारी की समझ को आकार देता रहा।
वकील से सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस तक
कार्की ने 1978 में वकालत शुरू की और धीरे-धीरे न्यायपालिका में अपनी अलग पहचान बनाई। 2009 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का अस्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 2010 में स्थायी जज बनीं। 11 जुलाई 2016 को उन्होंने नेपाल की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाला। हालांकि उनका कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन उस दौरान उनके फैसलों ने उन्हें देशभर में लोकप्रिय बना दिया।
निर्भीक फैसलों से मिली पहचान
उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने तत्कालीन मंत्री जे.पी. गुप्ता को जेल भेजने और लोकमान सिंह कार्की को पद से हटाने जैसे ऐतिहासिक फैसले दिए। यह पहली बार था जब किसी मौजूदा मंत्री को अदालत से सीधे जेल भेजा गया। दबावों के बावजूद कार्की ने न्याय के सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, जिससे वह साहसी और ईमानदार जज के रूप में स्थापित हुईं।
जेन-ज़ी की उम्मीदों पर खरा उतरना चुनौती
प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभालते ही कार्की के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरने की है जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है। निष्क्रिय संस्थान, कमजोर पुलिस मनोबल और क्षतिग्रस्त सरकारी ढांचे जैसे संकट उनके सामने खड़े हैं। साथ ही उन्हें उद्योगपतियों और आम जनता को भरोसा दिलाना होगा कि देश स्थिरता और पारदर्शिता की ओर बढ़ रहा है।
एक नई शुरुआत की उम्मीद
कार्की का नेतृत्व नेपाल की राजनीति में नई हवा लेकर आया है। एक महिला प्रधानमंत्री के रूप में वह न सिर्फ जेन-ज़ी के सपनों का प्रतीक बनी हैं बल्कि दशकों से पुरुष-प्रधान राजनीति में बदलाव का संकेत भी देती हैं। अब देखना होगा कि क्या वह इस ऐतिहासिक अवसर को स्थायी सुधारों में बदल पाती हैं या नहीं।
