कभी पंजाब का नाम आते ही पराली जलाने की तस्वीरें सामने आती थीं — धुएँ से ढके आसमान और साँस लेने में तकलीफ़ की खबरें। लेकिन अब कहानी बदल गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की अगुवाई में पंजाब के किसानों ने एक नई दिशा पकड़ी है, जिसे “पराली क्रांति” कहा जा रहा है।
हाल ही में एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) आयोग के चेयरमैन राजेश वर्मा ने जब राजपुरा थर्मल प्लांट का दौरा किया, तो वे किसी को नोटिस देने या जुर्माना लगाने नहीं आए थे। वे यहाँ आए थे यह देखने कि कैसे पंजाब के किसान देश के लिए एक नई मिसाल बना रहे हैं — अब वही पराली जो कभी जलाकर बर्बाद कर दी जाती थी, आज किसानों के लिए कमाई का साधन बन चुकी है।
पराली जलाने में 85% की कमी
अभी कुछ साल पहले तक पंजाब में पराली जलाना एक बड़ी समस्या थी। साल 2021 में 71,300 घटनाएँ दर्ज हुई थीं। लेकिन 2024 तक यह घटकर सिर्फ 10,900 रह गईं — यानी 85% की कमी। इस साल यानी 2025 में अब तक सिर्फ 3,284 मामले सामने आए हैं। यह बदलाव बताता है कि पंजाब के किसान अब न केवल अनाज उगा रहे हैं, बल्कि वातावरण की रक्षा भी कर रहे हैं।
पराली से अब बन रहा है ईंधन
राजेश वर्मा ने कहा, “अब धान की पराली किसानों के लिए आय का स्रोत बन गई है।” पहले इसे बेकार समझकर जलाया जाता था, लेकिन अब यही पराली थर्मल पावर प्लांट्स में बायोमास फ्यूल के रूप में इस्तेमाल हो रही है। इससे कोयले की खपत घट रही है और प्रदूषण भी कम हो रहा है।
राजपुरा थर्मल पावर प्लांट में कोयले के साथ बायोमास मिलाकर बिजली बनाई जा रही है। इससे किसानों को पराली बेचकर आमदनी होती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता।
किसानों को मिला सरकार का साथ
यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे सरकार की योजनाएँ और किसानों की मेहनत है। पंजाब सरकार ने बायोमास संग्रह केंद्र बनाए, मशीनों पर सब्सिडी दी, और किसानों को प्रशिक्षण देकर समझाया कि पराली को जलाने के बजाय इसे कैसे बेचा जा सकता है।
आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार की इस पहल को अब दूसरे राज्य भी मॉडल के रूप में देख रहे हैं। किसानों को आर्थिक मदद और नई तकनीक से जोड़कर राज्य ने यह साबित किया कि सही नीति से बड़े बदलाव संभव हैं।
दिल्ली और पंजाब में बड़ा फर्क
जबकि दिल्ली और आसपास के इलाकों में अभी भी प्रदूषण की समस्या बनी हुई है, पंजाब ने समस्या को जड़ से हल किया। यहाँ प्रशासन ने किसानों के साथ मिलकर काम किया, न कि उनके खिलाफ। यही फर्क पंजाब को आगे ले गया।
राजेश वर्मा ने कहा, “किसान अब पराली जलाने की जगह उसे इकट्ठा कर रहे हैं और बेच रहे हैं। यह सच्ची ‘स्टबल रेवोल्यूशन’ है।”
किसानों की नई पहचान
पंजाब के किसानों के लिए यह सिर्फ पर्यावरण की रक्षा का मामला नहीं है — यह उनकी नई पहचान है। अब वे न केवल देश को भोजन दे रहे हैं, बल्कि हवा को भी साफ़ रखने में योगदान दे रहे हैं। यह बदलाव दिखाता है कि खेती और पर्यावरण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
दीवाली के इस मौसम में, जब पंजाब का आसमान पहले से ज्यादा साफ़ है, यह किसानों की मेहनत और जिम्मेदारी की जीत है। पंजाब की यह कहानी बताती है कि जब समुदाय को सही दिशा और समर्थन मिलता है, तो वे चमत्कार कर सकते हैं।
