एक नौजवान, जो कभी इंजीनियर बनने का सपना देखता था, पिछले 13 सालों से बिस्तर पर खामोश पड़ा है। यह कहानी है हरीश राणा की, जिसकी सांसें तो चल रही हैं, लेकिन वह खुद अपने जीवन का एहसास नहीं कर पा रहा। उसकी पूरी दुनिया अब सिर्फ 6×4 का एक बिस्तर बनकर रह गई है।
उसकी मां, जो कभी बेटे की लंबी उम्र की दुआ करती थी, अब उसकी बेबसी देखकर भगवान से उसकी मुक्ति की प्रार्थना करने लगी। आखिरकार परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट की संवेदनशील टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथ की पीठ ने गहरी संवेदनशीलता दिखाई। जस्टिस पारदीवाला ने अपने फैसले की शुरुआत शेक्सपियर की प्रसिद्ध पंक्ति “होना या न होना” से की, जो जीवन और मृत्यु के बीच की पीड़ा को दर्शाती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में एक्टिव इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) की अनुमति नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) पर विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मरीज की गरिमा, निजता और शारीरिक सम्मान को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए।
कौन है हरीश राणा?
हरीश राणा का सपना इंजीनियर बनने का था। उनके माता-पिता ने भी बड़े अरमानों के साथ उन्हें चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई के लिए भेजा था। लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी।
कॉलेज से लौटने के बाद वह अपने पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी से नीचे गिर गए। इस हादसे में उनके सिर में गंभीर चोट लगी और वह कोमा में चले गए। पहले चंडीगढ़ और बाद में दिल्ली के एम्स में उनका इलाज हुआ, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया।
परिवार की कठिन संघर्ष भरी जिंदगी
आज हरीश न बोल सकते हैं, न हंस सकते हैं और न ही खुद करवट बदल सकते हैं। उन्हें लिक्विड भोजन पाइप के जरिए दिया जाता है और उनकी देखभाल पूरी तरह दूसरों पर निर्भर है।
अपने बेटे की देखभाल के लिए पिता को नौकरी तक छोड़नी पड़ी। इलाज के खर्च और देखभाल की जिम्मेदारी ने परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर कर दी। यहां तक कि परिवार को अपना घर बेचने तक की नौबत आ गई।
अदालत तक पहुंची मां की गुहार
हरीश की मां ने अपने बेटे की पीड़ा देखकर अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। परिवार ने 2018 और 2023 में सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी, लेकिन उस समय उनकी याचिका स्वीकार नहीं हुई।
आखिरकार लंबे इंतजार और कानूनी प्रक्रिया के बाद 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसने इस दर्दभरी कहानी को एक नया मोड़ दे दिया।
