देश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। यह बिल महिलाओं को संसद में ज्यादा प्रतिनिधित्व देने के लिए लाया गया था, लेकिन जरूरी समर्थन न मिलने के कारण यह गिर गया।
दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई सरकार
इस बिल को पास कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी, लेकिन सरकार यह आंकड़ा हासिल नहीं कर सकी। वोटिंग के दौरान 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में वोट दिया, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। यह संख्या जरूरी सीमा से कम थी, इसलिए बिल पास नहीं हो पाया।
क्या था इस बिल का मकसद
इस संविधान संशोधन बिल का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग 33% सीटें आरक्षित करना था। इससे महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की जा रही थी।
हालांकि इस बिल को परिसीमन यानी सीटों के नए बंटवारे से जोड़ा गया था, जिससे विवाद और बढ़ गया।
परिसीमन से जुड़ने पर बढ़ा विवाद
सरकार ने महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया के साथ जोड़ दिया था। परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर सीटों का नया निर्धारण करना।
इसी मुद्दे पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया। विपक्ष का कहना था कि महिलाओं को आरक्षण देने का समर्थन सभी करते हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना गलत है।
कुछ नेताओं ने इसे राजनीतिक रणनीति बताते हुए कहा कि इससे कुछ राज्यों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है।
संसद में जोरदार बहस
इस बिल को लेकर लोकसभा में तीखी बहस देखने को मिली। सरकार ने सभी दलों से समर्थन की अपील की, लेकिन विपक्ष ने कई सवाल उठाए।
विपक्षी नेताओं का कहना था कि महिलाओं के नाम पर यह बिल असल में राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश है। वहीं सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया।
सरकार और विपक्ष की अलग राय
सरकार का कहना था कि यह बिल महिलाओं को संसद में बराबरी का मौका देगा और देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाएगा।
वहीं विपक्ष ने कहा कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इस बिल के तरीके से असहमत हैं। कई दलों ने स्पष्ट किया कि वे महिलाओं को आरक्षण देने का समर्थन करते हैं, लेकिन परिसीमन के साथ इसे जोड़ना सही नहीं है।
परिसीमन बिल पर भी असर
महिला आरक्षण बिल के पास न होने का असर परिसीमन बिल पर भी पड़ा। सरकार ने संकेत दिए हैं कि अब परिसीमन से जुड़े अन्य बिलों को भी आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, क्योंकि दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
राजनीति में बड़ा असर
इस घटनाक्रम को सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। यह पहली बार है जब इस तरह का महत्वपूर्ण संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका।
