अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। कुछ समय पहले तक 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुका कच्चा तेल अब 77 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गया है। यह पिछले चार महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। तेल की कीमतों में आई इस गिरावट ने दुनिया भर के बाजारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
युद्ध के दौरान बढ़ी थी चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के दौरान वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिली थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित होने की आशंका के कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं। इसका असर कई देशों में ईंधन और गैस की कीमतों पर पड़ा था। भारत समेत कई देशों में महंगाई बढ़ने और ईंधन की लागत बढ़ने की चिंता भी सामने आई थी।
अब क्या है तेल का ताजा भाव?
ताजा आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 76.47 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रही है। वहीं WTI क्रूड करीब 72.63 डॉलर प्रति बैरल और मुरबन क्रूड लगभग 69.63 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तनाव कम होने और सप्लाई की स्थिति सुधरने से कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
सप्लाई बढ़ने से मिली राहत
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद वैश्विक सप्लाई चेन में सुधार की उम्मीद बढ़ी है। ईरानी तेल की बिक्री को लेकर कुछ राहत मिलने और खाड़ी क्षेत्र के कई उत्पादन केंद्रों के फिर से सक्रिय होने से बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है। इसके अलावा एशियाई देशों को कच्चे तेल की आपूर्ति भी बेहतर होने की संभावना जताई जा रही है।
पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा या नहीं?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पेट्रोल और डीजल भी सस्ते होंगे। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन की कीमतें केवल कच्चे तेल के भाव पर निर्भर नहीं करतीं। इसमें टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च और मार्केटिंग लागत जैसी कई चीजें शामिल होती हैं। इसलिए कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तुरंत कटौती की संभावना कम मानी जा रही है।
भारत को मिल सकती है आर्थिक राहत
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत के आयात बिल पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा और महंगाई को नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है। साथ ही तेल आयात पर होने वाला खर्च घटने से अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
