पिछले कुछ दिनों में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में लगातार बारिश और बादल फटने से भारी तबाही देखी गई। कई सड़कें और राजमार्ग बाढ़ से डूब गए, नदियां और नाले उफान पर रहे और बांधों से छोड़े गए पानी ने हालात बिगाड़ दिए। अब मौसम विभाग की ताजा चेतावनी उत्तराखंड को लेकर आई है। 31 अगस्त से 1 सितंबर 2025 के बीच राज्य में भारी बारिश का दौर शुरू हो सकता है, जो अगले हफ्ते के मध्य तक भी जारी रह सकता है।
स्काईमेट वेदर का अनुमान
प्राइवेट मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर के अनुसार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा पर बना निम्न दबाव क्षेत्र तेजी से पश्चिम और उत्तर की ओर बढ़ रहा है। यह सिस्टम मॉनसून ट्रफ से जुड़कर उत्तराखंड की तराई और निचली पहाड़ियों तक असर डाल सकता है। इसके साथ पश्चिमी विक्षोभ भी सक्रिय रहेगा, जिससे बारिश की तीव्रता और ज्यादा बढ़ सकती है।
कुमाऊं में सबसे ज्यादा खतरा
उत्तराखंड का पूर्वी हिस्सा यानी कुमाऊं मंडल इस खराब मौसम से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। तराई और निचले इलाकों में खतरा ज्यादा रहेगा। पंतनगर में पिछले 24 घंटे में 113 मिमी बारिश दर्ज की गई है। रुद्रपुर, उधमसिंहनगर, सितारगंज, काशीपुर और पंतनगर को रेड अलर्ट जोन माना जा रहा है।
मध्य पहाड़ियों में भूस्खलन का डर
चंपावत, बागेश्वर, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चमोली जैसे जिलों में भी भारी बारिश का असर होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश थमने के बाद भी यहां भूस्खलन और मिट्टी-धसाव का खतरा लंबे समय तक बना रह सकता है। पहाड़ी इलाकों में सफर करने वालों को खास सावधानी बरतने की जरूरत है।
गढ़वाल क्षेत्र को भी रहना होगा सतर्क
भले ही कुमाऊं में असर ज्यादा दिखेगा, लेकिन गढ़वाल क्षेत्र भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यहां भी भारी बारिश, नदियों के उफान और अचानक आने वाली बाढ़ से खतरा बना रहेगा। स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
मुंबई की झीलें भरकर लबालब
इधर मुंबई में लगातार बारिश ने शहर की जल समस्या को फिलहाल खत्म कर दिया है। बीएमसी के आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई की सातों झीलें 96.16% क्षमता तक भर चुकी हैं। 26 अगस्त 2025 की सुबह तक झीलों में 13,91,854 मिलियन लीटर पानी जमा है, जबकि शहर की सालाना जरूरत 14,47,363 मिलियन लीटर है।
362 दिन का पानी स्टोर
मुंबई की रोजाना खपत करीब 3,850 मिलियन लीटर है। मौजूदा स्टोरेज के हिसाब से शहर के पास करीब 362 दिन का पानी सुरक्षित है। यानी इस साल पानी कटौती का संकट नहीं होगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ती आबादी और बदलते मौसम को देखते हुए लंबे समय के लिए ठोस योजना बनाना बेहद जरूरी है।
