पंजाब के वन भवन, एस.ए.एस. नगर में राज्य वन्य जीव बोर्ड की स्थायी समिति की पांचवीं बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता पंजाब के वन एवं वन्य जीव संरक्षण मंत्री लाल चंद कटारूचक्क ने की। इस दौरान प्रशासनिक सचिव (वन) कमल किशोर यादव वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से जुड़े, जबकि प्रमुख मुख्य वन पाल धर्मिंदर शर्मा, मुख्य वन्य जीव वार्डन सतिंदर सागर, वन विभाग और जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। बैठक में नदियों के संरक्षण, बाढ़ प्रबंधन और वन्य जीवों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
ब्यास और रावी नदी की डी-सिल्टिंग पर विचार
बैठक में पिछले वर्ष आई बाढ़ के बाद नदियों में बड़ी मात्रा में जमा हुई सिल्ट और रेत को हटाने के प्रस्तावों पर चर्चा की गई। जल संसाधन विभाग ने ब्यास और रावी नदी के विभिन्न स्थानों पर डी-सिल्टिंग करने के लिए कुल आठ प्रस्ताव प्रस्तुत किए। अधिकारियों ने बताया कि नदी में अत्यधिक सिल्ट जमा होने से जल प्रवाह प्रभावित होता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए समय रहते डी-सिल्टिंग करना आवश्यक माना गया।
छह स्थानों के प्रस्ताव आगे भेजने की सिफारिश
विस्तृत विचार-विमर्श के बाद समिति ने ब्यास नदी में होशियारपुर जिले की दो, कपूरथला जिले की तीन और गुरदासपुर जिले की एक साइट पर डी-सिल्टिंग के प्रस्तावों को मंजूरी के लिए नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्टैंडिंग समिति के पास भेजने की सिफारिश की। इसके अलावा रावी नदी में कथलोर-कुशलिया वन्य जीव सेंचुरी से सटी एक साइट पर भी डी-सिल्टिंग का प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया। समिति ने इन प्रस्तावों में पर्यावरण संरक्षण और जनहित दोनों पहलुओं को प्राथमिकता दी।
आईआईटी रोपड़ की रिपोर्ट बनी आधार
वन विभाग को शुरुआत में ब्यास नदी के लगभग 30 अलग-अलग स्थानों पर डी-सिल्टिंग का प्रस्ताव मिला था। चूंकि ब्यास नदी एक कंजर्वेशन रिजर्व होने के साथ-साथ रामसर साइट भी है, इसलिए यहां डॉल्फिन, घड़ियाल और कई दुर्लभ जलीय जीव पाए जाते हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि डी-सिल्टिंग का काम वन्य जीवों के लिए नुकसानदायक न हो। इसी उद्देश्य से आईआईटी रोपड़ से विस्तृत अध्ययन कराया गया, जिसमें बाढ़ नियंत्रण और वन्य जीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के उपाय सुझाए गए।
विशेषज्ञ समिति ने किया विस्तृत निरीक्षण
आईआईटी रोपड़ की रिपोर्ट मिलने के बाद विशेषज्ञ समिति ने सभी 30 प्रस्तावित स्थानों का दौरा किया। निरीक्षण के दौरान नदी के प्रवाह, सिल्ट की मात्रा, आसपास के प्राकृतिक आवास और वन्य जीवों की स्थिति का गहन अध्ययन किया गया। जांच के बाद समिति ने केवल छह स्थानों पर डी-सिल्टिंग की सिफारिश की। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्थानों पर अत्यधिक सिल्ट जमा होने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदल गया है और कई वन्य जीवों के आवास भी प्रभावित हुए हैं। डी-सिल्टिंग से नदी की गहराई बढ़ने, जल प्रवाह बेहतर होने और भविष्य में बाढ़ के खतरे को कम करने में मदद मिलने की संभावना जताई गई।
