पंजाब सरकार किसानों की आय बढ़ाने और राज्य में गिरते भू-जल स्तर की चुनौती से निपटने के लिए फसल विविधीकरण को प्राथमिकता दे रही है। सरकार का कहना है कि धान-गेहूं के पारंपरिक फसल चक्र पर निर्भरता कम कर किसानों को मक्का, दालें, तिलहन, बागवानी और अन्य कम पानी वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और जल संरक्षण के अनुकूल बनाना है।
राज्य सरकार के अनुसार, खरीफ 2025-26 सीजन में फसल विविधीकरण कार्यक्रम के तहत करीब 5.84 लाख एकड़ क्षेत्र को धान के बजाय वैकल्पिक फसलों के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए किसानों को मक्का, कपास, मूंग, अरहर, बाजरा और अन्य फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहन राशि और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।
सरकार ने मक्का की खेती को बढ़ावा देने के लिए ₹17,500 प्रति हेक्टेयर (लगभग ₹7,000 प्रति एकड़) तक की वित्तीय सहायता देने की योजना लागू की है। इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण बीज, कृषि यंत्र, प्रशिक्षण और विपणन सहायता भी किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है। कृषि विभाग किसानों को नई फसलों की वैज्ञानिक खेती और आधुनिक तकनीकों की जानकारी देने के लिए गांव स्तर पर जागरूकता अभियान भी चला रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में धान की खेती के कारण हर वर्ष बड़ी मात्रा में भू-जल का दोहन होता है। अनुमान है कि एक किलोग्राम धान पैदा करने में 3,000 से 5,000 लीटर तक पानी की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलें कम पानी में तैयार हो जाती हैं। ऐसे में फसल विविधीकरण न केवल किसानों की लागत कम कर सकता है, बल्कि भू-जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सरकार का दावा है कि फसल विविधीकरण के साथ-साथ किसानों को बेहतर बाजार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (जहां लागू हो), फूड प्रोसेसिंग उद्योगों से जोड़ने और मूल्य संवर्धन की सुविधाएं विकसित करने पर भी काम किया जा रहा है। इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने और आय बढ़ने की संभावना है।
पंजाब सरकार का कहना है कि आने वाले वर्षों में फसल विविधीकरण को और तेज़ी से लागू किया जाएगा। यदि किसान बड़े पैमाने पर वैकल्पिक फसलें अपनाते हैं, तो इससे राज्य में जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण संतुलन और किसानों की आर्थिक स्थिति—चारों क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।
