राज्यसभा सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने इतिहास में दर्ज “कामागाटा मारू” जहाज़ को इसके असली नाम ‘गुरु नानक जहाज़’ के रूप में मान्यता दिलवाने और हर वर्ष 23 जुलाई को राष्ट्रीय स्तर पर स्मृति दिवस के रूप में मनाने की मांग को लेकर राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन को एक महत्त्वपूर्ण पत्र लिखा है। संत सीचेवाल ने अपने पत्र में ज़ोर देकर कहा है कि आज से ठीक 111 साल पहले, 23 जुलाई 1914 को यह ऐतिहासिक जहाज़ कनाडा से भारत के लिए रवाना हुआ था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने साज़िश के तहत कोलकाता के बजबज घाट पर रोका और वहाँ अंधाधुंध गोलियां चलाकर 19 निर्दोष यात्रियों को शहीद कर दिया गया।
संत सीचेवाल ने बताया कि इतिहास में जिसे आज ‘कामागाटा मारू’ के नाम से जाना जाता है, उसका असल नाम ‘गुरु नानक जहाज़’ था। बाबा गुरदित्त सिंह, जो गदर आंदोलन के अग्रणी नेता थे, उन्होंने इस जहाज़ को ‘गुरु नानक स्टीमशिप कंपनी’ के नाम से रजिस्टर करवाया था। इस जहाज़ में न सिर्फ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश होता था, बल्कि सिख संगत के द्वारा कीर्तन भी किया जाता था, जिससे यह जहाज़ आस्था, एकता और स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया था।
इस जहाज़ में कुल 376 यात्री सवार थे, जिनमें 340 सिख, 12 हिंदू और 24 मुस्लिम थे। इन यात्रियों ने नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी और उनकी कुर्बानी को भुलाया नहीं जाना चाहिए। संत सीचेवाल ने यह भी ज़िक्र किया कि जहाज़ की टिकटों पर भी ‘गुरु नानक जहाज़’ ही छपा होता था।
बाबा गुरदित्त सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘श्री गुरु नानक जहाज़ दे मुसाफरां दी दर्द भरी कहानी’ और इतिहासकार डॉ. गुरदेव सिंह सिद्धू की पुस्तक ‘श्री गुरु नानक जहाज़ (कामागाटा मारू जहाज़ समकालीन बृतांत)’ में भी यही प्रमाणित होता है कि इस जहाज़ का असली नाम ‘गुरु नानक जहाज़’ था।
संत सीचेवाल ने राज्यसभा से अपील की है कि गुरु नानक जहाज़ को उसका सही ऐतिहासिक दर्जा दिया जाए, इस घटना के शहीदों को राष्ट्रीय सम्मान मिले, और 23 जुलाई को एक राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाए ताकि देश की भावी पीढ़ी इस ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदान को हमेशा याद रखे।
