बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुक्रवार को पूरी हो गई। निर्वाचन आयोग के अनुसार, पहले चरण में कुल 121 विधानसभा सीटों के लिए अब तक 1,250 से अधिक उम्मीदवारों ने अपने नामांकन दाखिल किए हैं। अंतिम आंकड़े अभी आने बाकी हैं, इसलिए यह संख्या और बढ़ सकती है।
पहले चरण के मतदान में कई बड़े नेताओं की साख दांव पर है। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) — यानी भाजपा और जदयू — पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ चुनाव मैदान में उतर चुका है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री संजय जायसवाल ने अपने प्रचार अभियानों में विकास कार्यों और सुशासन को मुख्य मुद्दा बनाया है।
वहीं, विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन (राजद, कांग्रेस, वामदल और वीआईपी पार्टी) में स्थिति थोड़ी उलझी हुई नजर आ रही है। सीट बंटवारे पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई है, जिससे कई जगहों पर एक ही गठबंधन के दो-दो उम्मीदवार मैदान में हैं।
सीट बंटवारे पर असमंजस
राजद और कांग्रेस के बीच कई सीटों पर मतभेद सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, जाले सीट पर कांग्रेस ने राजद नेता ऋषि मिश्रा को अपने चुनाव चिन्ह पर लड़ने की अनुमति दी है। लेकिन लालगंज सीट पर राजद ने कांग्रेस को कोई रियायत नहीं दी, जहाँ माफिया से राजनीति में आईं शिवानी शुक्ला (मुन्ना शुक्ला की पुत्री) ने राजद से नामांकन दाखिल किया है, जबकि कांग्रेस के आदित्य कुमार राजा भी उसी सीट से मैदान में हैं।
इसी तरह वैशाली और कहलगांव में भी कांग्रेस और राजद के उम्मीदवार आमने-सामने हैं, जिससे गठबंधन के भीतर असंतोष के संकेत मिल रहे हैं।
वामदलों और कांग्रेस के बीच भी टकराव
‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल वामदलों — सीपीआई, सीपीएम और भाकपा (माले) — ने भी अपनी पारंपरिक सीटों पर दावे ठोक दिए हैं। बछवाड़ा, राजापाकर और रोसेरा जैसी सीटों पर कांग्रेस और वाम उम्मीदवार आमने-सामने हैं। इससे संकेत मिल रहा है कि यदि 20 अक्टूबर तक कोई नाम वापस नहीं लेता है, तो कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ यानी दोस्ताना मुकाबले की स्थिति बन सकती है।
चुनावी तस्वीर
पहले चरण में जिन सीटों पर मतदान होगा, वे मुख्य रूप से मगध, मिथिलांचल और सीमांचल क्षेत्रों में आती हैं। यहाँ पिछली बार राजद को अच्छी बढ़त मिली थी, लेकिन इस बार NDA इसे बदलने की पूरी कोशिश में है।
जहाँ एनडीए अपनी एकजुटता और संगठन पर भरोसा जता रहा है, वहीं विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेदों ने उसकी रणनीति को कमजोर किया है। चुनावी समीकरण लगातार बदल रहे हैं, और अब सभी की नजरें नाम वापसी की आखिरी तारीख — 20 अक्टूबर — पर टिकी हैं।
