पाकिस्तान की सियासत एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। खबरें आ रही हैं कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और सेना प्रमुख असीम मुनीर के बीच गहरे मतभेद हैं। चर्चा यह भी है कि मुनीर देश में फौजी तख्तापलट कर खुद राष्ट्रपति बनने की योजना बना रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीति एक नए मोड़ की तरफ बढ़ रही है।
जुलाई का महीना पाकिस्तान के लिए हमेशा से राजनीतिक तौर पर अशांत रहा है। 5 जुलाई 1977 को जनरल जिया-उल-हक़ ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। इसके बाद करीब 10 साल तक देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं हुए। अब एक बार फिर जुलाई में राजनीतिक संकट गहराता नजर आ रहा है।
इतिहास की बात करें तो 1958, 1977 और 1999 में पाकिस्तान में फौजी तख्तापलट हो चुका है। इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही बनते दिख रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, जरदारी और मुनीर के बीच लगातार टकराव बढ़ रहा है। सेना प्रमुख मुनीर का हाल ही में हुआ अमेरिका दौरा भी इस पूरे घटनाक्रम को और हवा दे रहा है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से ज्यादा बातचीत मुनीर से की, जिससे अमेरिका की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका नहीं चाहता कि चीन समर्थक जरदारी सत्ता में बने रहें। इसलिए वह मुनीर को समर्थन देकर उन्हें राष्ट्रपति बनाना चाहता है। कहा जा रहा है कि अमेरिका मुनीर को पाकिस्तान में बिटकॉइन और व्यापार के लिए एक मजबूत मोहरा बनाना चाहता है।
दूसरी ओर, पूर्व विदेश मंत्री और जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो का एक बयान भी चर्चा में है। उन्होंने कहा कि अगर भारत समर्थन करता है, तो वे हाफिज सईद और मसूद अजहर को पाकिस्तान को सौंप सकते हैं। इस बयान के बाद पाकिस्तान में हलचल मच गई है। उन्होंने सेना प्रमुख मुनीर पर भी निशाना साधा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जरदारी परिवार और फौज के बीच तनातनी बहुत बढ़ गई है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो इस समय मुनीर के लिए सबसे बड़ी चुनौती इमरान खान हैं, जो जेल में हैं लेकिन अब भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं। शरीफ परिवार भी मुनीर के समर्थन में मजबूरी में खड़ा है, क्योंकि अगर फौज से टकराव होता है, तो पूरा परिवार जेल जा सकता है।
अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो पाकिस्तान में जल्द ही बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। या तो जरदारी इस्तीफा देंगे या फिर सेना खुलकर सत्ता पर कब्जा कर लेगी। वैसे पाकिस्तान में फौजी दखलअंदाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार अमेरिका की भूमिका इसे और गंभीर बना रही है।
आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है, जिसकी गूंज सिर्फ देश में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई देगी।
