उत्तर भारत में पहली बार, पीजीआई चंडीगढ़ ने दिल की धड़कन की गंभीर गड़बड़ी से पीड़ित एक मरीज का इलाज अत्याधुनिक क्रायोएब्लेशन तकनीक से सफलतापूर्वक किया है। यह उपलब्धि संस्थान के कार्डियोलॉजी विभाग की टीम ने डॉ. यशपाल शर्मा की निगरानी और डॉ. सौरभ महरोत्रा की अगुवाई में हासिल की। यह तकनीक अब तक केवल दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में ही उपलब्ध थी।
मरीज की स्थिति थी बेहद गंभीर
इलाज के लिए जिन मरीज को चुना गया, उसकी स्थिति पहले से ही जटिल थी। मरीज को पहले से पेसमेकर लगा हुआ था और वह एट्रियल फाइब्रिलेशन नामक बीमारी से पीड़ित था। इस स्थिति में दिल की ऊपरी दो कोषिकाएं (एट्रिया) अनियमित और अत्यधिक तेजी से धड़कती हैं, जिससे पूरे दिल की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। मरीज को अचानक एक्यूट डी-कम्पेन्सेटेड हार्ट फेलियर हुआ, जिसके चलते उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
पारंपरिक इलाज नहीं हुआ कारगर
डॉ. सौरभ महरोत्रा ने बताया कि मरीज को पहले रेट कंट्रोल तकनीक से राहत देने की कोशिश की गई, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। ऐसे में टीम ने क्रायोएब्लेशन तकनीक को अपनाने का फैसला किया। यह तकनीक बेहद संवेदनशील होती है और इसे विशेष प्रशिक्षण व विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
क्रायोएब्लेशन तकनीक: ठंड से नाड़ियों का निष्क्रियकरण
क्रायोएब्लेशन प्रक्रिया में बहुत ही ठंडे तापमान का उपयोग करके दिल की उन नाड़ियों को स्थायी रूप से निष्क्रिय कर दिया जाता है, जो दिल की धड़कनों को अनियमित बना रही होती हैं। जैसे ही इस प्रक्रिया से संबंधित नसों को टारगेट किया गया, मरीज की स्थिति में तुरंत सुधार देखा गया। डॉक्टरों के अनुसार, यह इलाज जटिल था लेकिन बिल्कुल सटीक तरीके से किया गया।
हज़ारों मरीजों के लिए राहत की उम्मीद
पीजीआई की यह उपलब्धि उन हज़ारों मरीजों के लिए आशा की नई किरण है जो दिल की धड़कन की गड़बड़ी से पीड़ित हैं और जिन्हें अब इलाज के लिए दिल्ली या मुंबई जाने की आवश्यकता नहीं होगी। स्थानीय स्तर पर यह सुविधा मिलना स्वास्थ्य सेवाओं में एक बड़ी क्रांति के रूप में देखा जा रहा है।
उपलब्धि का श्रेय डॉक्टरों की टीम को
इस सफलता के लिए संस्थान ने डॉ. सौरभ महरोत्रा और उनकी टीम की सराहना की है, जिन्होंने इस नई तकनीक को अपनाकर मरीज के जीवन को एक नया मौका दिया। भविष्य में इस तकनीक को और मरीजों के इलाज में भी अपनाया जाएगा।
