दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने साल 2026 में संभावित “सुपर एल नीनो” को लेकर चिंता जताई है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत महासागर यानी Pacific Ocean सामान्य से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। अगर यह स्थिति आगे बढ़ती रही, तो आने वाले महीनों में दुनिया को भीषण गर्मी, सूखा और मौसम की चरम घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह एल नीनो सामान्य नहीं बल्कि “सुपर एल नीनो” बन सकता है, जो पिछले कई दशकों के सबसे ताकतवर मौसमीय बदलावों में शामिल हो सकता है।
आखिर क्या होता है एल नीनो?
एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।
जब समुद्र का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और यह सामान्य स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है, तब उसे “सुपर एल नीनो” कहा जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक 1950 के बाद ऐसे बहुत कम सुपर एल नीनो देखने को मिले हैं।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि सुपर एल नीनो का सबसे बड़ा असर भारत के मानसून और गर्मी पर पड़ सकता है। इससे देश में हीटवेव यानी लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं और मानसून कमजोर रहने की आशंका भी है।
अगर बारिश सामान्य से कम हुई, तो इसका असर खेती, जल संकट और बिजली की मांग पर भी दिखाई दे सकता है। कई राज्यों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले भी मजबूत एल नीनो के दौरान भारत में सूखा और भीषण गर्मी जैसी स्थिति देखने को मिली थी।
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही खतरा
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण सुपर एल नीनो का असर पहले से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। धरती पहले ही लगातार गर्म हो रही है और ऐसे में एल नीनो अतिरिक्त गर्मी जोड़ सकता है।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर सुपर एल नीनो बहुत मजबूत हुआ, तो दुनिया का औसत तापमान अस्थायी रूप से 1.5°C की महत्वपूर्ण सीमा को पार कर सकता है।
खेती और अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका
सुपर एल नीनो का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहता। इससे फसल उत्पादन, खाद्य कीमतें, पानी की उपलब्धता और अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक एशिया के कई देशों में सूखा और पानी की कमी की स्थिति बन सकती है, जबकि कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
भारत में खासतौर पर कृषि क्षेत्र पर इसका असर सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी अब भी मानसून आधारित खेती पर निर्भर है।
