संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बड़ा कूटनीतिक टकराव देखने को मिला है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से लगभग 20% वैश्विक तेल सप्लाई गुजरती है। हाल के तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के कारण यहां जहाजों की आवाजाही काफी प्रभावित हुई है, जिससे दुनियाभर में ऊर्जा संकट गहराने लगा है।
अरब देशों का प्रस्ताव और विवाद
इस स्थिति को संभालने के लिए अरब देशों की ओर से एक प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें जहाजों की सुरक्षा के लिए “जरूरी सभी कदम” उठाने की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव का मतलब था कि जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई भी की जा सकती है। लेकिन इसी बिंदु पर विवाद खड़ा हो गया और कई देशों ने इसका विरोध किया।
रूस, चीन और फ्रांस का विरोध
रूस, चीन और फ्रांस जैसे शक्तिशाली देशों ने इस प्रस्ताव में सैन्य ताकत के इस्तेमाल का विरोध किया। उनका मानना है कि इस तरह का कदम हालात को और ज्यादा बिगाड़ सकता है और संघर्ष को बढ़ा सकता है। इन देशों ने कहा कि समाधान कूटनीतिक तरीके से निकालना ज्यादा जरूरी है, न कि बल प्रयोग से।
संशोधित प्रस्ताव में बदलाव
विरोध के बाद प्रस्ताव में बदलाव किया गया। नए ड्राफ्ट में “सभी जरूरी कदम” जैसी भाषा को हटाकर सिर्फ “रक्षात्मक उपाय” रखने की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि अब केवल जहाजों की सुरक्षा के लिए सीमित कदम उठाने की अनुमति होगी, न कि आक्रामक सैन्य कार्रवाई की।
तेल और वैश्विक बाजार पर असर
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव का सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा है। जहाजों की आवाजाही कम होने से सप्लाई चेन भी प्रभावित हो रही है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
UNSC में बढ़ती खींचतान
इस मुद्दे पर UNSC के अंदर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। एक तरफ कुछ देश तुरंत कार्रवाई के पक्ष में हैं, जबकि दूसरी तरफ कई देश शांति और बातचीत के जरिए समाधान चाहते हैं। इस कारण प्रस्ताव पर सहमति बनाना मुश्किल हो गया है और अंतिम फैसला काफी अहम माना जा रहा है।
अब सभी की नजर UNSC की वोटिंग पर टिकी हुई है। यह तय करेगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट को कैसे संभालेगा। अगर समझौता होता है तो जहाजों की आवाजाही बहाल हो सकती है, लेकिन मतभेद जारी रहने पर स्थिति और जटिल हो सकती है।
