अमेरिकी राजनीति में H1B वीजा को लेकर एक बार फिर से बड़ा विवाद छिड़ गया है। रिपब्लिकन सीनेटर माइक ली ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (Twitter) पर पोस्ट करते हुए सवाल उठाया कि क्या अब H1B वीजा पर रोक लगाने का समय आ गया है? यह बयान उस समय आया, जब एक पोस्ट में दावा किया गया कि वॉलमार्ट के एक अधिकारी को भारतीय H1B कर्मचारियों को प्राथमिकता देने के लिए रिश्वत दी गई थी। इस आरोप ने अमेरिकी राजनीति में पहले से चल रही H1B बहस को और तेज कर दिया है।
H1B वीजा क्या है?
साल 1990 में शुरू हुआ H1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने की अनुमति देता है।
- यह वीजा आमतौर पर तीन साल के लिए जारी किया जाता है और अधिकतम छह साल तक बढ़ाया जा सकता है।
- हर साल अमेरिकी सरकार 65,000 H1B वीजा जारी करती है।
- इसके अलावा 20,000 अतिरिक्त वीजा उन विदेशी छात्रों को दिए जाते हैं जिन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर या PhD किया हो।
भारत लंबे समय से इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है, खासकर आईटी और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में।
अमेरिकी राजनीति में मतभेद
H1B वीजा को लेकर अमेरिकी नेताओं के बीच गहरी खींचतान है।
- उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि बड़ी टेक कंपनियां पहले अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देती हैं और फिर H1B वीजा पर विदेशी कर्मचारियों को रख लेती हैं। उन्होंने इसे अमेरिकी पेशेवरों के साथ अन्याय बताया।
- दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने पहले H1B कार्यक्रम को “शानदार” बताया था। उनका कहना था कि इस वीजा के जरिए कई कंपनियों को टैलेंटेड लोग मिलते हैं और ये कर्मचारी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं।
USCIS का नया रुख
अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवाओं (USCIS) के नए निदेशक जोसेफ एडलो ने कहा है कि H1B वीजा का उद्देश्य अमेरिकी कामगारों को बदलना नहीं, बल्कि उन्हें सपोर्ट करना होना चाहिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अब H1B वीजा लॉटरी सिस्टम खत्म करने और वेतन-आधारित प्राथमिकता प्रणाली लागू करने पर विचार कर रहा है। इसका मतलब है कि जो कर्मचारी ज्यादा वेतन पर काम करेंगे, उन्हें वीजा मिलने की संभावना ज्यादा होगी।
भारतीयों पर सीधा असर
H1B वीजा में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीयों का होता है। हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और आईटी प्रोफेशनल इसी वीजा के जरिए अमेरिका जाते हैं।
- अगर इस पर रोक लगाई गई या नियम सख्त किए गए तो सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय आईटी सेक्टर को होगा।
- अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों में भारतीय कर्मचारियों की संख्या बहुत ज्यादा है, ऐसे में वीजा नियम बदलने से उनका भविष्य प्रभावित हो सकता है।
- भारतीय टैलेंट का अमेरिका में जाना कम हो गया तो भारत के आईटी सेक्टर पर दबाव बढ़ेगा और अमेरिकी कंपनियों को भी स्किल्ड प्रोफेशनल्स की कमी झेलनी पड़ेगी।
अमेरिका में H1B वीजा को लेकर विवाद नया नहीं है, लेकिन इस बार रिपब्लिकन नेताओं के कड़े रुख ने भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ा दी है। जहां एक ओर कुछ अमेरिकी नेता इसे स्थानीय कर्मचारियों के साथ अन्याय मानते हैं, वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी मानते हैं। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप प्रशासन इस पर क्या फैसला लेता है।
