अमेरिका इन दिनों एक अजीब और गंभीर संकट से गुजर रहा है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कदम उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर देश में कुशल कामगारों की रिकॉर्ड कमी पैदा हो गई है। स्थिति यह है कि लाखों युवा नौकरी की तलाश में घूम रहे हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण सेक्टरों में वेल्डर, प्लंबर, ऑटो मैकेनिक और इलेक्ट्रिशियन जैसे पेशेवर नहीं मिल पा रहे।
कंपनियां दे रहीं करोड़ों की सैलरी, फिर भी नहीं मिल रहे योग्य उम्मीदवार
इस संकट का स्तर इतना बढ़ गया है कि कई अमेरिकी कंपनियां स्किल्ड तकनीशियनों को सालाना 1 करोड़ रुपये (लगभग 1,20,000 डॉलर) तक की सैलरी देने को तैयार हैं। यह अमेरिका की औसत आय से लगभग दोगुनी है। इसके बावजूद कंपनियों को उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहे।
देश में वर्तमान समय में 10 लाख से ज्यादा हाई-स्किल्ड तकनीकी पद खाली पड़े हैं, जिससे उत्पादन, निर्माण, मरम्मत, परिवहन और ऑटो उद्योग तक प्रभावित हो रहे हैं।
समाज में ‘ब्लू-कॉलर जॉब्स’ की कम प्रतिष्ठा बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार इस भारी कमी की सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिकी समाज में लंबे समय से ब्लू-कॉलर नौकरियों को कमतर समझा जाता है।
आमतौर पर माता-पिता अपने बच्चों को चार साल की डिग्री और व्हाइट-कॉलर करियर की ओर बढ़ने को प्रेरित करते हैं। इसके चलते वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन या मैकेनिक जैसे पेशे कम महत्व वाले समझे जाते हैं, जबकि इनकी मांग लगातार बढ़ रही है।
टेक्निकल ट्रेनिंग की कमी बनी चिंता का कारण
स्किल्ड ट्रेड्स में आगे बढ़ने के लिए सालों की ट्रेनिंग और अनुभव की जरूरत होती है।
अमेरिका में बीते कई वर्षों से वोकेशनल एजुकेशन और अप्रेंटिसशिप में निवेश कम किया गया है, जिसकी वजह से युवा इन क्षेत्रों में करियर चुनने से हिचकते हैं।
नतीजा यह हुआ कि बड़े उद्योगों से लेकर सार्वजनिक ढांचे तक, हर जगह काम रुक रहा है और देश की आर्थिक गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है।
अगर समस्या हल न हुई तो अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते यह कमी दूर नहीं की गई तो इसका असर अमेरिका की सप्लाई चेन, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बेहद नकारात्मक होगा।
कई कंपनियां पहले ही अपनी परियोजनाएं धीमी करने पर मजबूर हैं, क्योंकि प्रशिक्षित तकनीशियन मिल ही नहीं रहे।
