अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने भारत को चांद पर स्थायी बेस बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना में शामिल होने का न्योता दिया है। यह प्रस्ताव भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते सहयोग को एक नई दिशा दे सकता है। योजना के तहत चांद के दक्षिणी ध्रुव के आसपास लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित करने पर जोर है।
बेंगलुरु में हुई अहम बैठक
NASA का यह निमंत्रण बेंगलुरु में ISRO मुख्यालय में हुई अमेरिका-भारत सिविल स्पेस ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप की नौवीं बैठक के दौरान सामने आया। इस बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ अंतरिक्ष अधिकारियों ने हिस्सा लिया। NASA ने 11 अगस्त को कहा कि वह भारत को मून बेस कार्यक्रम में भागीदार के रूप में देखना चाहता है। दोनों देशों ने अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े डेटा को साझा करने पर भी सहयोग बढ़ाने की बात कही।
क्या है आर्टेमिस समझौता?
मून बेस योजना का संबंध NASA के नेतृत्व वाले आर्टेमिस कार्यक्रम और आर्टेमिस समझौते से है। इसका उद्देश्य चांद और भविष्य में उससे आगे अंतरिक्ष की सुरक्षित, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार खोज के लिए देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है। भारत 2023 में आर्टेमिस समझौते में शामिल हुआ था। अब इस समझौते से 70 देश जुड़ चुके हैं।
भारत को मिल सकती है आधुनिक तकनीक
भारत के लिए इस साझेदारी का सबसे बड़ा फायदा अत्याधुनिक अंतरिक्ष तकनीक तक पहुंच हो सकता है। चंद्रमा पर रहने के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम, रोबोटिक्स, लूनर हैबिटेट और डीप-स्पेस मिशन जैसी तकनीकों की जरूरत होगी। NASA के साथ मिलकर काम करने से ISRO को इन क्षेत्रों में अनुभव और नई तकनीक विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
गगनयान और भविष्य के मिशनों को बढ़ावा
इस सहयोग से भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम को भी मजबूती मिल सकती है। भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा तक भेजने की योजना के लिए लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने, चंद्र सतह पर काम करने और जीवन-रक्षा प्रणालियों जैसी तकनीकों का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण होगा।
भारत की अंतरिक्ष ताकत और बढ़ेगी
चांद पर स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार करना बेहद महंगा और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण काम है। ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होकर भारत विशेषज्ञता और संसाधनों को साझा कर सकता है। इससे वैज्ञानिक शोध के साथ-साथ अंतरिक्ष उद्योग और भविष्य की तकनीकी परियोजनाओं के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मून बेस कार्यक्रम में भारत की सटीक भूमिका क्या होगी।
