भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूती देने में प्रवासी भारतीयों (NRI) का अहम योगदान है। विदेशों में बसे भारतीयों ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि वे सिर्फ अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी रीढ़ की हड्डी हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रवासी भारतीयों ने 135.46 अरब डॉलर यानी लगभग 11.63 लाख करोड़ रुपये भारत भेजे हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।
रेमिटेंस ने तोड़ा हर रिकॉर्ड
ये पहली बार हुआ है जब भारत को मिलने वाली रेमिटेंस (प्रवासी धन) की रकम एफडीआई (विदेशी निवेश) से भी अधिक हो गई है। यह दिखाता है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं, बल्कि अपने देश और परिवार के लिए उनकी भावनात्मक और वित्तीय प्रतिबद्धता भी बढ़ी है।
8 साल में दोगुनी से ज्यादा बढ़ी रेमिटेंस
अगर हम आठ साल पहले के आंकड़ों पर नज़र डालें तो उस समय भारत को 61 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिली थी। यानी इतने कम समय में प्रवासी भारतीयों ने अपनी देशभक्ति और मेहनत से यह रकम दोगुनी से भी ज़्यादा कर दी है। हर साल औसतन इसमें 16% की वृद्धि हो रही है।
भारत बना दुनिया का नंबर 1 रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है।
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भारत – 11.63 लाख करोड़ रुपये
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मैक्सिको – 5.8 लाख करोड़ रुपये
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चीन – 4.1 लाख करोड़ रुपये
इन आंकड़ों से साफ है कि भारत की वैश्विक स्थिति लगातार मजबूत हो रही है और उसका सबसे बड़ा श्रेय जाता है विदेशों में बसे भारतीयों को।
व्यापार घाटे की भरपाई में मदद
भारत को हर साल भारी मात्रा में तेल और अन्य सामान आयात करना पड़ता है जिससे व्यापार घाटा बढ़ता है। लेकिन रेमिटेंस से करीब 47% तक इस घाटे की भरपाई हो जाती है। यानी एनआरआई पैसे भेजकर सिर्फ अपने परिवार का ही नहीं, देश की आर्थिक सेहत का भी ख्याल रखते हैं।
किन देशों से आता है सबसे ज्यादा पैसा?
RBI की रिपोर्ट के मुताबिक भारत को मिलने वाली कुल रेमिटेंस का
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अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर से आने वाली रकम 45% है।
इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय बसे हुए हैं जो आईटी, मेडिकल, इंजीनियरिंग और व्यापार जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
देश से दूर लेकिन दिल से जुड़े
विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे भले ही शारीरिक रूप से भारत से दूर हों, लेकिन उनका दिल आज भी भारत में ही धड़कता है। उनकी मेहनत और लगन ने भारत की आर्थिक तस्वीर को नया रूप दिया है। ऐसे में देश को भी चाहिए कि वह एनआरआई समुदाय के हितों की रक्षा करे और उन्हें और बेहतर अवसर प्रदान करे ताकि यह संबंध और भी मजबूत हो सके।
