16 अप्रैल 2026 से संसद का विशेष सत्र शुरू होते ही माहौल गरमा गया। लोकसभा में जैसे ही डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल और संविधान संशोधन बिल पेश किए गए, विपक्षी दलों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके के नेताओं ने इन बिलों को लेकर सवाल उठाए और इसे संविधान के खिलाफ बताया।
क्या है डीलिमिटेशन बिल
डीलिमिटेशन का मतलब होता है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना। सरकार इस प्रक्रिया के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाओं में बदलाव करना चाहती है। प्रस्ताव के मुताबिक लोकसभा की सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक किया जा सकता है।
महिलाओं को आरक्षण से जुड़ा है मुद्दा
इस पूरे प्रस्ताव का एक बड़ा उद्देश्य महिलाओं को 33% आरक्षण देना भी है। सरकार चाहती है कि सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए जगह बनाई जाए, ताकि संसद में उनकी भागीदारी बढ़ सके। यह योजना 2029 के आम चुनावों से लागू करने की तैयारी है।
विपक्ष ने उठाए कई सवाल
विपक्ष का कहना है कि यह बिल जल्दबाजी में लाया गया है और इसमें कई खामियां हैं। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार जनगणना से अलग होकर परिसीमन करना चाहती है, जो सही नहीं है। वहीं समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा उठाया, जबकि अन्य दलों ने इसे लोकतांत्रिक संतुलन के खिलाफ बताया।
उत्तर बनाम दक्षिण की बहस
इस बिल को लेकर देश में “उत्तर बनाम दक्षिण” की बहस भी तेज हो गई है। दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होने से उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा फायदा मिलेगा।
सदन में वोटिंग और बहस
लोकसभा में बिल पेश करने को लेकर वोटिंग भी कराई गई। इस दौरान पक्ष में ज्यादा वोट पड़े और बिल को आगे की चर्चा के लिए मंजूरी मिल गई। हालांकि विपक्ष ने अपना विरोध जारी रखा और कहा कि इस मुद्दे पर विस्तृत बहस जरूरी है।
बड़े राजनीतिक बदलाव की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बिल पास होता है, तो यह भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। लोकसभा की सीटें बढ़ने और परिसीमन होने से चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। इसके साथ ही महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से संसद का स्वरूप भी बदलने की उम्मीद है।
