अमेरिका लगातार इमिग्रेशन नियमों को सख्त कर रहा है। हाल ही में H-1B वीज़ा से जुड़ा एक बड़ा फैसला सामने आया, जिसने विदेशी प्रोफेशनल्स और अमेरिकी संस्थानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीज़ा के लिए 1 लाख अमेरिकी डॉलर की भारी फीस तय किए जाने के बाद अब इस फैसले को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है।
20 राज्यों ने दाखिल किया मुकदमा
कैलिफोर्निया, मैसाचुसेट्स समेत अमेरिका के 20 राज्यों ने इस नई नीति के खिलाफ मैसाचुसेट्स की एक फेडरल कोर्ट में मुकदमा दायर किया है। राज्यों का कहना है कि H-1B वीज़ा आवेदन पर 100,000 डॉलर की फीस लगाना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि इससे जरूरी सार्वजनिक सेवाओं पर भी गंभीर असर पड़ेगा।
होमलैंड सिक्योरिटी की नीति पर सवाल
यह मुकदमा सीधे तौर पर होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की उस नीति को चुनौती देता है, जिसके तहत H-1B वीज़ा प्रोग्राम के जरिए विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं की लागत अचानक बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई है। राज्यों का कहना है कि इतनी भारी फीस छोटे संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
कैलिफोर्निया अटॉर्नी जनरल का बयान
इस केस की अगुवाई कर रहे कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बॉन्टा ने साफ कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास इतनी ज्यादा फीस लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उनके अनुसार यह नीति सार्वजनिक संस्थानों पर गैर-कानूनी वित्तीय बोझ डालती है और इससे स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रिसर्च जैसे अहम क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी और बढ़ सकती है।
सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ सकता है असर
राज्यों की दलील है कि H-1B वीज़ा पर अस्पताल, विश्वविद्यालय और सरकारी स्कूल काफी हद तक निर्भर हैं। अगर इतनी भारी फीस लागू होती है, तो इन संस्थानों के लिए विदेशी टैलेंट को रखना मुश्किल हो जाएगा। इसका सीधा असर मरीजों, छात्रों और शोध कार्यों पर पड़ सकता है।
कानून उल्लंघन का आरोप
मुकदमे में यह भी कहा गया है कि यह नीति कांग्रेस के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर एक्ट का उल्लंघन करती है। राज्यों का मानना है कि बिना उचित प्रक्रिया और सलाह के ऐसा फैसला लागू करना कानून के खिलाफ है।
भारतीय प्रोफेशनल्स पर भी असर
H-1B वीज़ा प्रोग्राम भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का एक अहम रास्ता माना जाता है, खासकर टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर और अकादमिक रिसर्च सेक्टर में। अगर यह नीति लागू रहती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय आईटी और मेडिकल प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है।
