वॉशिंगटन/कीव। रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को शुरू हुए दो साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक इसका कोई स्थायी हल नहीं निकल सका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार पहल की गई, लेकिन बातचीत नाकाम रही। इसी बीच अब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और मौजूदा समय में बड़ी राजनीतिक हैसियत रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे इस मसले में दखल दिया है। ट्रंप सोमवार (18 अगस्त) को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से मुलाकात करेंगे।
ट्रंप की कड़ी शर्तें
सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप का कहना है कि अगर यूक्रेन तुरंत युद्ध खत्म करना चाहता है तो उसे कुछ सख्त शर्तें माननी होंगी। सबसे बड़ी शर्त यह है कि यूक्रेन को क्रीमिया पर दावा छोड़ना होगा। इसके अलावा यूक्रेन को नाटो (NATO) में शामिल न होने का वादा भी करना होगा।
दरअसल, क्रीमिया पर विवाद 2014 से चला आ रहा है। उस वक्त रूस ने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया था। अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से क्रीमिया यूक्रेन का हिस्सा माना जाता है, लेकिन व्यवहार में इस पर रूस का नियंत्रण है। यही वजह है कि इस मुद्दे पर समझौता करना यूक्रेन के लिए बेहद कठिन है।
अमेरिका की दोहरी रणनीति?
ट्रंप की इन शर्तों के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका हमेशा से यूक्रेन का समर्थन करता रहा है और उसे हथियारों की सप्लाई भी देता रहा है। लेकिन अब जब ट्रंप ने क्रीमिया छोड़ने जैसी शर्त रख दी, तो इसे अमेरिका की “दोहरी रणनीति” के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ मदद, दूसरी तरफ दबाव डालकर समझौते के लिए मजबूर करना।
ट्रंप और पुतिन की गुपचुप मुलाकात
इससे पहले शुक्रवार (15 अगस्त) को अलास्का में ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात हुई थी। दोनों नेताओं के बीच करीब तीन घंटे तक बंद कमरे में बातचीत चली। इसके बाद हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ 12 मिनट की थी और उसमें भी किसी बड़े सवाल का जवाब नहीं दिया गया। ट्रंप ने इतना ही कहा कि बैठक “सकारात्मक” रही और कई मुद्दों पर सहमति बनी है, लेकिन किसी ठोस डील का ऐलान नहीं हुआ।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और भविष्य
अब सबकी निगाहें आज होने वाली ट्रंप-जेलेंस्की मुलाकात पर टिकी हैं। क्या यूक्रेन इन शर्तों को मानने को तैयार होगा? क्या रूस अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा? और क्या अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है या फिर अपने राजनीतिक हित साध रहा है—इन सवालों पर पूरी दुनिया नज़र रखे हुए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूक्रेन क्रीमिया का मुद्दा छोड़ भी देता है, तब भी रूस-यूक्रेन सीमा पर विवाद खत्म होना आसान नहीं होगा। वहीं, नाटो में शामिल न होने का दबाव यूक्रेन की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकता है।
रूस-यूक्रेन जंग अब सिर्फ दो देशों का मामला नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर रहा है। ट्रंप की पहल से उम्मीदें तो जगी हैं, लेकिन उनकी रखी गई शर्तें इस संघर्ष को और जटिल भी बना सकती हैं। आज की ट्रंप-जेलेंस्की मीटिंग से हालात किस दिशा में जाते हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।
