पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवान ने माइनिंग रेगुलेशन कमेटी की सिफारिशों पर अगले आदेश तक रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम बताया। संधवान ने कहा कि यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब अरावली पहाड़ियों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे थे।
पहले दी गई मंजूरी पर दोबारा विचार
उन्होंने बताया कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक कमेटी द्वारा सुझाई गई अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी थी। लेकिन इस नई परिभाषा को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने कई आपत्तियां जताई थीं। इन्हीं शंकाओं को ध्यान में रखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेशों पर रोक लगाकर मामले पर दोबारा विचार करने का फैसला किया है।
अरावली की नई परिभाषा बनी विवाद की वजह
कुलतार सिंह संधवान के अनुसार, विवाद की असली वजह अरावली पहाड़ियों की बदली हुई परिभाषा है। नई परिभाषा के तहत केवल वही क्षेत्र पहाड़ी माना जाएगा, जिसकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ज्यादा हो। इस बदलाव से अरावली क्षेत्र की बड़ी संख्या में छोटी पहाड़ियां कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकती हैं।
90 प्रतिशत पहाड़ियों पर खतरे की आशंका
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई परिभाषा के लागू होने से अरावली की लगभग 90 प्रतिशत छोटी पहाड़ियों को संरक्षण नहीं मिल पाएगा। इसका सीधा फायदा माइनिंग और रियल एस्टेट गतिविधियों को मिल सकता है। यदि इन पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर खुदाई और निर्माण शुरू हुआ, तो इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है।
उत्तर भारत के लिए ‘ग्रीन वॉल’ हैं अरावली
अरावली पहाड़ियां उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती हैं। ये रेगिस्तान से आने वाली धूल और रेत को दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों तक पहुंचने से रोकती हैं। अगर इन पहाड़ियों को नुकसान पहुंचा, तो धूल भरी आंधियों और वायु प्रदूषण का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
संधवान की अपील: पर्यावरण पहले
कुलतार सिंह संधवान ने साफ कहा कि कमर्शियल हितों से ज्यादा जरूरी पर्यावरण की सुरक्षा है। उन्होंने मांग की कि अरावली पहाड़ियों की टिकाऊ और प्रभावी सुरक्षा के लिए तुरंत ठोस कदम उठाए जाएं। उनके अनुसार, अरावली को नुकसान सिर्फ किसी एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं होगी, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण पर पड़ेगा।
