मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच दुनिया की नजर Strait of Hormuz पर टिकी हुई है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अनुमान है कि रोजाना करीब 1.5 से 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल यहीं से होकर वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। इसलिए यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
कौन-कौन करता है इस रास्ते से निर्यात?
इस मार्ग से सबसे ज्यादा तेल निर्यात करने वाले देशों में सऊदी अरब करीब 38% हिस्सेदारी के साथ आगे है। इराक लगभग 22%, यूएई 15%, ईरान 11%, कुवैत 9% और कतर 5% हिस्सा रखते हैं। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इन देशों की सप्लाई बाधित हो सकती है।
किन देशों की है सबसे ज्यादा निर्भरता?
एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस रूट पर काफी निर्भर हैं। चीन लगभग 33% तेल आयात इसी रास्ते से करता है। भारत करीब 13%, दक्षिण कोरिया 12% और जापान 11% आयात करता है। बाकी एशियाई देश और अन्य राष्ट्र भी इसी मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल मंगाते हैं। इसलिए यह मार्ग एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल
ईरान पर हालिया हमलों और जवाबी कार्रवाई के बाद तेल बाजार में तेजी आई है। कुछ ही दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 12% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई।
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25 फरवरी को कीमत लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल थी।
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2 मार्च को यह बढ़कर 77 डॉलर के पार पहुंच गई।
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3 मार्च को यह करीब 79.60 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
यह तेजी दिखाती है कि बाजार संभावित सप्लाई रुकावट को लेकर चिंतित है। अगर तनाव और बढ़ता है, तो कीमतें 80 डॉलर से ऊपर भी जा सकती हैं।
भारत और दुनिया पर असर
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आयात करने वाले देशों में महंगाई बढ़ सकती है। भारत जैसे देश, जहां ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आयात से आता है, वहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
क्यों है यह समुद्री मार्ग इतना महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ संकरा जरूर है, लेकिन यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माना जाता है। अगर यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो दुनिया भर में तेल की कमी और बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।
