दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई, संसद और सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और व्यापारियों को हुए आर्थिक नुकसान से जुड़े मामलों पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने प्रदर्शन करने के अधिकार और आम लोगों के कारोबार पर पड़ने वाले असर के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही।
चीफ जस्टिस ने कहा कि देश के हर नागरिक को विरोध जताने का अधिकार है, लेकिन कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता।
व्यापारियों के नुकसान और प्रदर्शन के अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने बताया कि इन मामलों को पांच अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। केंद्र सरकार की तरफ से जवाब तैयार कर लिए गए हैं। इनमें हेबियस कॉर्पस याचिकाएं, पत्रकारों से जुड़े मामले और प्रदर्शन स्थल को डिनोटिफाई करने का विषय शामिल है। उन्होंने कहा कि केंद्र की ओर से जवाब की प्रतियां याचिकाकर्ताओं को भी दी जाएंगी।
वहीं, वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दिल्ली में लगातार हो रहे प्रदर्शनों से व्यापारियों को होने वाले नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि त्योहारों के दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर छोटे व्यापारियों की कमाई पर पड़ रहा है।
उन्होंने आशंका जताई कि कारोबारियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। ऐसे में सवाल है कि इस नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी किसकी होगी?
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक तरफ लोगों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, तो दूसरी तरफ व्यापार और रोजगार करने का भी अधिकार है। अदालत ने कहा कि उन लोगों की आजीविका का सवाल भी महत्वपूर्ण है, जो रोज कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि प्रदर्शन की भी अपनी एक अर्थव्यवस्था होती है।
दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि सरकार ने ही जंतर-मंतर को डिनोटिफाई किया और रामलीला मैदान में प्रदर्शन की अनुमति दी है। उनका कहना था कि हर प्रदर्शन स्थल के आसपास कोई न कोई बाजार मौजूद होता है। साथ ही, निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर किसी तरह की हिंसा या हंगामा नहीं हुआ।
CJI की दो टूक- कोई एक जगह पर हमेशा के लिए नहीं बैठ सकता
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि किसी भी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर कोई व्यक्ति या संगठन स्थायी रूप से कब्जा नहीं जमा सकता।
उन्होंने सवाल किया कि अगर किसान, वकील या दूसरे संगठन अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना चाहें तो उनके लिए जगह कहां होगी?
CJI ने कहा कि विरोध प्रदर्शन सभी का अधिकार है, लेकिन कोई भी संगठन यह दावा नहीं कर सकता कि उसने एक जगह पर कब्जा कर लिया है और अब वहां दूसरे लोगों को प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलेगी। प्रदर्शन के लिए तय स्थानों पर सीमित अवधि तक ही धरना दिया जा सकता है और इस व्यवस्था का पालन सभी को करना होगा।
इस दौरान SG तुषार मेहता ने बताया कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को केवल एक दिन के लिए प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, लेकिन उन्होंने निर्धारित समय के बाद भी जगह खाली नहीं की और संसद की तरफ मार्च किया।
उन्होंने कहा कि संसद केवल एक राजनीतिक इमारत नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता का प्रतीक है। ऐसे में संसद तक मार्च करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? इसी तरह सुप्रीम कोर्ट तक मार्च भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
SG ने यह सवाल भी उठाया कि जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं, वे दूसरे पक्ष की बात सुनने से क्यों बचते हैं?
प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक पर सवाल
सुनवाई में दिल्ली पुलिस की ओर से प्रदर्शनकारियों की पहचान और निगरानी के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी सामने आया।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस संबंध में दाखिल याचिका का हवाला देते हुए सवाल किया कि प्रदर्शन के दौरान लोगों की निगरानी किस कानूनी आधार पर की जा रही है?
इस पर SG तुषार मेहता ने कहा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर खुले तौर पर प्रदर्शन कर रहा है, तो ऐसे में निजता के अधिकार का सवाल कैसे उठाया जा सकता है? उन्होंने दलील दी कि इसी आधार पर तो सार्वजनिक सुरक्षा के लिए लगाए गए CCTV कैमरों पर भी आपत्ति की जा सकती है।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि फेस रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल उचित और विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए।
महिला पत्रकारों और पुलिसकर्मियों के साथ कथित बदसलूकी का मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों और महिला पुलिसकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला भी उठा।
दिल्ली पुलिस की ओर से SG तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान महिला पुलिस अधिकारियों के साथ भी अभद्रता और छेड़छाड़ की घटनाएं हुई थीं।
वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने महिला पुलिसकर्मियों के कथित उत्पीड़न से संबंधित याचिका का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक महिला पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की की थी।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अदालत में इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए।
इसके बाद कोर्ट ने महिला पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी से जुड़े मामले को अन्य संबंधित याचिका के साथ जोड़ दिया। हालांकि, महिला पत्रकारों के उत्पीड़न से जुड़े मामले की अलग से सुनवाई होगी। अदालत ने इसे 23 नवंबर को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
राहुल गांधी, खड़गे और अखिलेश यादव समेत कई नेताओं को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने के मामले पर भी सुनवाई हुई।
चार वकीलों की ओर से दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि विपक्षी नेताओं का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश थी।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक लामबंदी और सार्वजनिक प्रदर्शनों का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसी गतिविधियों से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने और अदालत पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
इस मामले में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, कांग्रेस और अन्य संबंधित पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और निजी प्रतिवादियों को 18 नवंबर तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।
प्रदर्शन से जुड़े मामलों को नौ श्रेणियों में बांटकर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि प्रदर्शन और उससे जुड़े विभिन्न विवादों को नौ अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर सुना जाएगा। अदालत इन सभी मुद्दों पर अलग-अलग तारीखों में सुनवाई करेगी, ताकि प्रत्येक मामले पर विस्तार से विचार किया जा सके।
फिलहाल व्यापारियों के अधिकारों से जुड़ी याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। साथ ही याचिकाकर्ताओं को उन आयोजकों को भी मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दी है, जिन पर प्रदर्शन के चलते कारोबारियों को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं।
