पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आज सुखबीर सिंह बादल पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि अब शिअद के बिखराव का दौर शुरू हो चुका है, इसी कारण सुखबीर बादल उन नेताओं को वापस बुलाने की बातें कर रहे हैं जो पहले पार्टी छोड़ चुके हैं।
मान ने तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने पहले ही कह दिया था कि शिरोमणि अकाली दल का सफर 1920 में शुरू हुआ था और 2019 में खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि आज हालात ऐसे हैं कि अगर शिअद कोई जांच समिति भी बनाना चाहे, तो उसके लिए 11 सदस्य नहीं मिलते, इसलिए तीन या पांच सदस्यों की छोटी समिति बनानी पड़ती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी शिअद का इतिहास मोर्चों और कुर्बानियों से भरा हुआ था। पहले यह धारणा थी कि अगर कोई युवक बिगड़ रहा है तो उसे अकाली दल में शामिल करा दो, वह सुधर जाएगा। लेकिन अब समय बदल गया है। आज अगर किसी अच्छे-भले युवक को शिअद में शामिल करा दिया जाए तो वह या तो नशा बेचने लगेगा या खुद नशा करने लगेगा।
मान ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल के रिश्तों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि खुद प्रकाश सिंह बादल सुखबीर को कहते थे कि अपने साले को काबू में रखो, लेकिन सुखबीर ने उनकी बात कभी नहीं मानी। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि सुखबीर बादल अक्सर कहते हैं कि पंजाब में जो भी विकास हुआ, वह प्रकाश सिंह बादल के समय में हुआ, लेकिन असलियत में जमीन पर कोई विकास दिखाई नहीं देता।
उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता अब पुराने वादों और खोखली बातों से थक चुकी है। लोग चाहते हैं कि राज्य में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हो, लेकिन शिअद के नेताओं के पास इन मुद्दों पर कोई ठोस योजना नहीं है। मान ने कहा कि उनकी सरकार पारदर्शिता और जनहित के कामों पर जोर दे रही है, जबकि अकाली दल का ध्यान सिर्फ सत्ता पाने और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने पर है।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि आज का समय बदलाव का है और पंजाब के लोग भी बदलाव चाह रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि आम आदमी पार्टी सरकार ने कम समय में कई ऐसे कदम उठाए हैं जो आने वाले वर्षों में राज्य की दिशा और दशा बदल देंगे। वहीं, अकाली दल का जनाधार लगातार कमजोर हो रहा है क्योंकि जनता अब उनके पुराने कामों से प्रभावित नहीं है।
मान के इन बयानों से यह साफ है कि पंजाब की राजनीति में आने वाले दिनों में अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बीच टकराव और तेज़ हो सकता है। शिअद के सामने जहां पार्टी को फिर से मजबूत करने की चुनौती है, वहीं आम आदमी पार्टी अपने कामकाज के आधार पर जनता के बीच पैठ बनाने में लगी है।
