12 जून को अहमदाबाद से उड़ान भरने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट 171 एक भयानक दुर्घटना का शिकार हो गई, जिसमें 260 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में 19 लोग जमीन पर मौजूद थे। यह भारत के इतिहास में सबसे बड़े विमान हादसों में से एक बन गया है। घटना के तुरंत बाद, हादसे के कारणों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।
NTSB प्रमुख का बयान: मीडिया रिपोर्ट्स पर सवाल
अमेरिका की नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड (NTSB) की प्रमुख जेनिफर होमेंडी ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों को “जल्दबाजी में किए गए अनुमान” करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की एयरक्राफ्ट एक्सिडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) की ओर से सिर्फ प्राथमिक जांच रिपोर्ट जारी की गई है और पूरी जांच में समय लगेगा। उनके अनुसार, जब तक अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आते, किसी भी प्रकार की अफवाह या अनुमान से बचना चाहिए।
AAIB की शुरुआती रिपोर्ट: ईंधन सप्लाई में बाधा और कॉकपिट भ्रम
AAIB द्वारा जारी की गई शुरुआती रिपोर्ट में बताया गया है कि टेक-ऑफ के कुछ ही क्षणों बाद विमान की फ्यूल सप्लाई अचानक रुक गई थी। कॉकपिट में एक पायलट ने इस पर चिंता जाहिर की, लेकिन दूसरे ने उसे खारिज कर दिया। इसी आधार पर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने इसे “पायलट की गलती” या “कॉकपिट भ्रम” के रूप में पेश किया, जिससे और विवाद पैदा हुआ।
वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट पर AAIB की आपत्ति
विशेष रूप से वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट पर AAIB ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ब्लैक बॉक्स के विश्लेषण से पता चलता है कि कप्तान सुमीत सभरवाल ने जानबूझकर ईंधन कटऑफ स्विच बंद किए थे। AAIB ने इसे “अधूरी और अपुष्ट जानकारी” बताया है और कहा है कि ऐसी रिपोर्टें लोगों के बीच बेवजह डर और भ्रम फैला रही हैं।
ब्लैक बॉक्स डेटा: क्या खुद बंद हुए थे स्विच?
शुरुआती जांच के अनुसार, टेक-ऑफ के लगभग 30 सेकंड के भीतर इंजन 1 और 2 के फ्यूल स्विच “रन” से “कटऑफ” मोड में चले गए थे। ये घटना एक ही सेकंड के भीतर हुई, जो असामान्य है। बाद में स्विच को फिर से “रन” में लाया गया, लेकिन तब तक विमान ऊंचाई खो चुका था और दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि स्विच पायलटों ने बंद किए या तकनीकी खराबी से ऐसा हुआ।
जांच जारी, संयम बरतने की अपील
AAIB और NTSB दोनों ने आग्रह किया है कि जब तक अंतिम रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती, तब तक मीडिया और जनता को संयम बरतना चाहिए। ग़लत या अपुष्ट जानकारी, खासतौर पर ऐसे संवेदनशील मामलों में, न सिर्फ जांच को प्रभावित कर सकती है बल्कि लोगों में बेवजह भय भी फैला सकती है।
