भारतीय रुपया लगातार दबाव में नजर आ रहा है। बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार नौवें कारोबारी सत्र में कमजोर हुआ। शुरुआती कारोबार में रुपया 96.86 पर खुला और थोड़ी ही देर में 41 पैसे टूटकर 96.96 के स्तर तक पहुंच गया।
इस गिरावट के बाद अब बाजार में चर्चा तेज हो गई है कि जल्द ही रुपया 97 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है। रुपये की लगातार कमजोरी ने निवेशकों, कारोबारियों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना रुपया
साल 2026 में भारतीय रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। इस महीने अब तक इसमें करीब 1.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जबकि पूरे साल में रुपया 7 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है।
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात और कमजोर विदेशी निवेश के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपया कमजोर हो रहा है।
FII की बिकवाली से बढ़ा दबाव
विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII लगातार भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा वापस लेते हैं, तो उन्हें डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर मजबूत होता है और रुपया कमजोर पड़ जाता है।
इसके अलावा भारतीय शेयर बाजार में भी हाल के दिनों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है, जिसका असर मुद्रा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतें भी बड़ी वजह
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है। इससे भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट का असर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव ने भी चिंता बढ़ा दी है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक माना जाता है।
अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो खाड़ी देशों से तेल और अन्य सामान की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इससे भारत के आयात और निर्यात दोनों पर असर पड़ सकता है।
चालू खाते के घाटे को लेकर चिंता
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रुपये की कमजोरी से भारत का चालू खाते का घाटा यानी Current Account Deficit बढ़ सकता है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ता है।
इसके अलावा खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विदेशी निवेश में कमी और आर्थिक वृद्धि को लेकर बढ़ती चिंता ने रुपये की स्थिति को और नाजुक बना दिया है।
