सांस लेना भी हुआ मुश्किल
दिल्ली में ठंड के साथ-साथ प्रदूषण ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में खुली हवा में सांस लेना भी भारी पड़ रहा है। दिसंबर के महीने में राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पिछले सात सालों में सबसे खराब स्तर पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2018 के बाद यह सबसे ज्यादा प्रदूषित दिसंबर रहा, जब औसत AQI 349 दर्ज किया गया।
पिछले वर्षों से तुलना
यदि पिछले वर्षों की बात करें तो दिसंबर 2018 में औसत AQI 360 था। इसके बाद दिसंबर 2019 में 337, 2020 में 332, 2021 में 336, 2022 में 319, 2023 में 348 और दिसंबर 2024 में औसत AQI 294 दर्ज किया गया। इस तुलना से साफ है कि इस साल दिसंबर में प्रदूषण फिर से खतरनाक स्तर के करीब पहुंच गया है।
कितने दिन रहा ‘गंभीर’ हाल
इस महीने दिल्ली में कुल पांच दिन वायु गुणवत्ता ‘गंभीर’ श्रेणी में दर्ज की गई। बीते साल दिसंबर में ऐसे छह दिन रहे थे। सोमवार को शाम चार बजे AQI 401 तक पहुंच गया, जिससे स्थिति ‘गंभीर’ हो गई। वहीं रविवार को AQI 390 के साथ ‘अत्यंत खराब’ श्रेणी में रहा। इन आंकड़ों ने आम लोगों की चिंता और बढ़ा दी है।
पराली का योगदान कितना?
अक्सर सर्दियों में प्रदूषण के लिए पराली जलाने को बड़ा कारण माना जाता है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले आंकड़ों के अनुसार, इस साल दिसंबर के पहले पांच दिनों तक दिल्ली में पीएम 2.5 प्रदूषण में पराली का योगदान केवल 3.5 प्रतिशत रहा। इसके बावजूद दिल्ली-एनसीआर देश के सबसे प्रदूषित इलाकों में बना हुआ है।
आंकड़ों का आधार क्या है?
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 और पीएम 10 प्रदूषण के स्रोतों का आकलन करने के लिए अभी भी 2018 में किए गए टेरी-एआरएआई स्रोत विभाजन अध्ययन पर ही भरोसा किया जाता है। बोर्ड ने बताया कि इसके बाद से कोई बड़ा और व्यापक स्रोत विभाजन अध्ययन नहीं किया गया है, जिससे मौजूदा हालात की पूरी तस्वीर सामने आ सके।
कुल मिलाकर स्थिति
दिसंबर के इस दौर में दिल्ली का प्रदूषण यह दिखाता है कि केवल एक वजह को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। ठंडी हवाएं, कम हवा की गति, धुंध और स्थानीय स्रोत मिलकर हालात को और बिगाड़ देते हैं। लगातार खराब होती हवा लोगों की सेहत पर असर डाल रही है और यह मुद्दा एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
