शुक्रवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सात पैसे टूटकर 88.42 पर आ गया। शुरुआती कारोबार में ही रुपये की यह गिरावट निवेशकों के बीच चिंता का कारण बनी। विदेशी मुद्रा कारोबारियों का कहना है कि विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने और आयातकों की डॉलर की मांग ने रुपये पर दबाव बनाया है।
निर्यात पर टैरिफ का असर
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर जारी मुद्दों ने भी रुपये को कमजोर करने में भूमिका निभाई। निर्यात पर दबाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताओं ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है।
कैसे रहा आज का कारोबार
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले 88.39 पर खुला और कुछ ही देर में गिरकर 88.42 पर आ गया। यह गुरुवार के मुकाबले सात पैसे कमजोर रहा। गुरुवार को भी रुपया 24 पैसे टूटकर 88.35 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था।
डॉलर इंडेक्स और तेल की कीमतें
इस बीच, डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को मापता है, 0.10 प्रतिशत बढ़कर 97.62 पर पहुंच गया। वहीं, वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 0.83 प्रतिशत की गिरावट के साथ 65.82 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।
विदेशी पूंजी निकासी ने बढ़ाई मुश्किलें
बाजार जानकारों का कहना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की ओर से लगातार निकासी रुपये पर सबसे ज्यादा दबाव डाल रही है। निवेशकों की धारणा वैश्विक आर्थिक हालात और अमेरिका की नीतियों से प्रभावित हो रही है, जिससे भारतीय मुद्रा अपने निचले स्तर के आसपास पहुंच गई है।
आगे क्या उम्मीद?
विश्लेषकों का मानना है कि रुपये में निकट भविष्य में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। डॉलर की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता के चलते भारतीय रुपया दबाव में रह सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट रुपये के लिए थोड़ी राहत ला सकती है।
