भारत और पाकिस्तान के बीच 14 सितंबर को दुबई में होने वाले एशिया कप क्रिकेट मैच को लेकर राजनीतिक हलकों में तूफान खड़ा हो गया है। शिवसेना (UBT) के मुखपत्र सामना ने अपने 13 सितंबर के संपादकीय में इस मैच को केवल खेल नहीं बल्कि “राष्ट्रद्रोह” करार दिया है। अखबार का कहना है कि पहलगाम हमले जैसे ताजा जख्मों के बीच पाकिस्तान के साथ खेलना जनता की भावनाओं को आहत करता है और यह राष्ट्रीय अस्मिता पर सवाल खड़े करता है।
पहलगाम हमले का दर्द और जनता की संवेदनाएं
संपादकीय में सबसे ज्यादा जोर 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या वाले पहलगाम हमले के जख्म पर दिया गया। लेख का तर्क है कि जब तक आतंकवाद के ऐसे जख्म हरे हैं, तब तक पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना उन परिवारों का अपमान है जिन्होंने अपने प्रिय खोए। सामना ने सवाल उठाया कि क्या वित्तीय और कूटनीतिक फायदे जनता की भावनाओं और न्याय से ऊपर रखे जा सकते हैं।
“सुविधाजनक हिंदुत्व” पर तंज
शिवसेना ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता में “सुविधाजनक हिंदुत्व” और “सुविधाजनक राष्ट्रवाद” का खेल चल रहा है। लेख में आरोप लगाया गया कि सरकार चुनावी लाभ और बड़े आर्थिक सौदों के लिए भावनाओं का इस्तेमाल कर रही है। क्रिकेट से करोड़ों का कारोबार और सौदे होते हैं, जिनका फायदा सत्ता तंत्र को मिलता है।
पुराने वादे और बदली रणनीति
संपादकीय में पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के शुरुआती बयानों का हवाला दिया गया—जैसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पाकिस्तान को सबक सिखाने की चेतावनियां। लेकिन सवाल उठाया गया कि वही सरकार अब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट कूटनीति क्यों अपना रही है? सामना का कहना है कि घरेलू राजनीति में कट्टर नारों का इस्तेमाल हुआ लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबावों ने उन नारों को हकीकत में बदलने से रोक दिया।
अमेरिका और चीन का जिक्र
संपादकीय में अमेरिका और चीन की भूमिकाओं पर भी चर्चा की गई। कहा गया कि वैश्विक दबाव और अंतरराष्ट्रीय माहौल ने भारत को मजबूर किया कि वह पाकिस्तान के साथ खेल जारी रखे। लेख ने तंज कसते हुए पूछा कि बालासाहेब ठाकरे के जमाने का असली हिंदुत्व आज कहां है और मौजूदा “नकली हिंदुत्ववादी” क्यों खामोश हैं।
जनता की भावनाओं को नजरअंदाज करने का आरोप
संपादकीय का निष्कर्ष साफ है—पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने का फैसला केवल खेल या मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह संवेदना और नैतिकता से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है। सामना का कहना है कि अगर सरकार और खेल संस्थाएं जनता की भावनाओं को गंभीरता से नहीं लेंगी तो खेलों के जरिए बनने वाली ‘शांति’ और ‘सौहार्द’ की अवधारणा खोखली साबित होगी।
खेल से परे सवाल
अंत में संपादकीय ने पाठकों से अपील की कि वे सिर्फ खेल का रोमांच न देखें बल्कि यह भी समझें कि ऐसे फैसले राष्ट्रीय सम्मान और नैतिक प्राथमिकताओं से जुड़े हैं। सवाल यह है कि क्या क्रिकेट खेलना उन परिवारों के लिए अपमान नहीं है जिनके रिश्तेदार आतंकवाद के शिकार हुए? सामना का रुख साफ है—यह मैच खेलना केवल खेल का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की आत्म-गौरव की परीक्षा है।
