देश में मानसून के आने वाले महीनों को लेकर चिंता बढ़ गई है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अगस्त, सितंबर और अक्टूबर के दौरान एल नीनो (El Niño) का प्रभाव और मजबूत हो सकता है, जिससे मानसून कमजोर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि एल नीनो का असर लगातार बढ़ता रहा तो यह वर्ष 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है।
क्या होता है एल नीनो?
एल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में एल नीनो का संबंध अक्सर कम बारिश, लंबे सूखे दौर, अधिक तापमान और हीटवेव जैसी परिस्थितियों से देखा जाता है। हालांकि हर एल नीनो वर्ष में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि मानसून पर कई अन्य मौसमीय कारकों का भी प्रभाव रहता है।
अगस्त और सितंबर सबसे अहम महीने
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अगस्त और सितंबर मानसून के सबसे महत्वपूर्ण महीने होते हैं। इन्हीं महीनों में देश के अधिकांश हिस्सों में अच्छी बारिश होती है और खरीफ फसलों को सबसे अधिक पानी की जरूरत रहती है। यदि इन महीनों में बारिश सामान्य से कम रहती है तो धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। साथ ही जलाशयों में पानी का स्तर और भूजल पुनर्भरण भी प्रभावित हो सकता है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर आधारित है। कमजोर मानसून की स्थिति में कृषि उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्यान्न की कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की कमी का असर ग्रामीण आय, जल उपलब्धता और बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
मौसम विभाग लगातार कर रहा निगरानी
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने कहा है कि एल नीनो की स्थिति और मानसून की प्रगति पर लगातार नजर रखी जा रही है। मौसम विभाग समय-समय पर नए पूर्वानुमान जारी करेगा ताकि राज्यों, किसानों और संबंधित एजेंसियों को समय रहते आवश्यक जानकारी मिल सके। वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम की स्थिति में बदलाव संभव है, इसलिए आने वाले हफ्तों के पूर्वानुमानों पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।
